Bofors Case Supreme Court:नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बोफोर्स मामले से जुड़ी आखिरी लंबित अपील को खारिज कर दिया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने वकील अजय के. अग्रवाल की उस अपील पर आगे सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के पुराने फैसले को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खत्म कर चुका है। इसके अलावा इस मामले में सीबीआई की अपील भी पहले ही खारिज की जा चुकी है। ऐसे में अब मामले को आगे जारी रखने का कोई उचित आधार नहीं बचता।
हिंदुजा नाम हटाने की मांग
सुनवाई के दौरान वकील अजय अग्रवाल ने मामले में दिवंगत आरोपियों श्रीचंद पी. हिंदुजा और गोपीचंद पी. हिंदुजा के नाम हटाने के लिए अदालत से चार सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि मामला साल 2018 से लंबित है और इसे अब और आगे नहीं खींचा जा सकता। इसके साथ ही पीठ ने लंबित अपील पर आगे सुनवाई से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद करीब चार दशक से चर्चा में रहे बोफोर्स मामले के कानूनी सफर का अंत हो गया।
हाई कोर्ट का फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने 31 मई 2005 को हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने मामले की जांच को लेकर सीबीआई पर भी गंभीर टिप्पणी की थी।
अदालत ने कहा था कि जांच में सरकारी खजाने से करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके बावजूद मामले में आरोपों को साबित करने की स्थिति नहीं बन पाई। हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन नवंबर 2018 में शीर्ष अदालत ने सीबीआई की अपील भी खारिज कर दी थी।
कैसे शुरू हुआ विवाद
बोफोर्स विवाद की शुरुआत 24 मार्च 1986 को हुई थी। उस समय भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के साथ 400 हॉवित्जर तोप खरीदने के लिए करीब 1,437 करोड़ रुपये का समझौता किया था।
एक साल बाद अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने आरोप लगाया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए भारत में राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को कथित तौर पर अवैध कमीशन दिया गया। इस खुलासे के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया और बोफोर्स सौदा लंबे समय तक राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बना रहा।
CBI जांच और आरोपी
बोफोर्स मामले में जनवरी 1990 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान पूर्व बोफोर्स अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा, हिंदुजा बंधुओं और बाद में इतालवी कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोच्ची समेत कई लोगों के नाम सामने आए।
समय बीतने के साथ इस मामले में कई आरोपियों को राहत मिली, कुछ आरोपी बरी हो गए और कुछ की मौत हो गई। लंबी कानूनी प्रक्रिया और अलग-अलग अदालतों में चली सुनवाई के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी लंबित अपील को भी आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है।
चार दशक बाद अंत
बोफोर्स मामला भारतीय राजनीति और रक्षा सौदों के इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहा। 1980 के दशक में शुरू हुआ यह विवाद करीब 40 साल तक अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद इस मामले की बची हुई आखिरी कानूनी कार्यवाही भी समाप्त हो गई है।
