Delhi High Court News: दिल्ली हाई कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास को उनकी याचिका पर सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की। दोनों नेताओं ने अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने उनके पहले दिए गए शांति बनाए रखने के बॉन्ड के कथित उल्लंघन, बैरिकेड तोड़कर प्रदर्शन करने और संगठन के उद्देश्य को लेकर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि दोनों नेता Gen-Z नहीं हैं। इसके बाद उनकी ओर से याचिका वापस लेने का अनुरोध किया गया।
अदालत ने आशुतोष रांका और सौरव दास से क्या कहा?
न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद की पीठ के सामने सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं की हिरासत बढ़ाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। उनके वकील ने दलील दी कि हिरासत बढ़ाने का आदेश उचित नहीं था और जमानतदारों को स्वीकार नहीं किया गया।
इस पर हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया था और उसके बाद फिर कथित तौर पर उसका उल्लंघन किया, तो प्रशासन उनसे सख्ती क्यों न करे। अदालत ने यह भी पूछा कि जब मजिस्ट्रेट के सामने उसी दिन मामले पर सुनवाई होनी थी, तो हाई कोर्ट में तुरंत याचिका दाखिल करने की जरूरत क्या थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका में वह आम तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया की समीक्षा करती है, न कि हर मामले में निचली अदालत के फैसले की जगह अपना फैसला देती है। कोर्ट ने उन्हें वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने पर विचार करने की सलाह दी।
‘आप Gen-Z नहीं हैं’, कोर्ट ने उम्र पूछकर क्यों की टिप्पणी?
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों नेताओं की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि सौरव दास की उम्र 27 साल और आशुतोष रांका की उम्र करीब 31 साल है।
इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि वे Gen-Z नहीं हैं। सुनवाई में Gen-Z की उम्र-सीमा को लेकर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने कहा कि पहले छात्रों के विरोध प्रदर्शन का मुद्दा था, लेकिन अब संगठन अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन कर रहा है। ऐसे में संगठन के उद्देश्य और उसकी गतिविधियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह टिप्पणी दोनों नेताओं के प्रदर्शन और संगठन की भूमिका पर सुनवाई के दौरान की गई थी।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और बॉन्ड उल्लंघन का मामला क्या है?
यह विवाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, CJP नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े मुद्दों के विरोध में ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन का आह्वान किया था।
10 अक्टूबर को आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली में हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड देने के बाद छोड़ा गया। पुलिस का आरोप था कि इसके बाद भी उन्होंने प्रतिबंधित या डिनोटिफाइड क्षेत्र में प्रदर्शन की कोशिश की और बैरिकेड पार किए।
इसके बाद दोनों को फिर हिरासत में लिया गया और उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई। स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के आदेश में कहा गया कि दोनों ने पहले दिए गए बॉन्ड का उल्लंघन किया और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका बनी हुई थी। ये पुलिस और मजिस्ट्रेट के आदेश में दर्ज आरोप हैं; इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
विदेशों में हिंसक प्रदर्शनों का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दूसरे देशों में हुए प्रदर्शनों का उदाहरण भी दिया। अदालत ने कहा कि कुछ जगहों पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन बाद में आगजनी और इमारतों को जलाने जैसी घटनाओं में बदल गए।
कोर्ट की टिप्पणी का संदर्भ यह था कि जब प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ते हैं, तो उनके पीछे दूसरे लोग भी आ सकते हैं और स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो सकती है। अदालत ने सार्वजनिक शांति बनाए रखने और संभावित हिंसा को रोकने की जरूरत पर जोर दिया।
आशुतोष और सौरव ने याचिका क्यों वापस ली?
हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं को सलाह दी कि वे पहले स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने होने वाली सुनवाई का इंतजार करें। अदालत ने कहा कि अगर वहां से राहत नहीं मिलती, तो वे कानून के तहत उपलब्ध दूसरे विकल्प अपना सकते हैं।
इसके बाद दोनों नेताओं के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। इस तरह हाई कोर्ट ने उस याचिका पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया, बल्कि उन्हें वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया अपनाने का रास्ता बताया।
बाद में दोनों नेताओं को रिहा किया गया
21 अक्टूबर 2026 को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने जरूरी जमानती बॉन्ड स्वीकार करने के बाद आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई का आदेश दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों ने लिखित आश्वासन भी दिया कि जंतर-मंतर को कानूनी रूप से प्रदर्शन के लिए अधिसूचित किए जाने तक वे वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे।
उनकी रिहाई के साथ हिरासत से जुड़ा तत्काल विवाद एक नए चरण में पहुंचा, लेकिन प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस की कार्रवाई को लेकर बहस जारी है। निष्कर्ष
आशुतोष रांका और सौरव दास की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने शांति बनाए रखने के बॉन्ड के कथित उल्लंघन और प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाए। Gen-Z को लेकर की गई टिप्पणी भी चर्चा में रही। दोनों नेताओं ने हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस ली और बाद में मजिस्ट्रेट के आदेश पर रिहा हुए।
यह मामला एक बार फिर बताता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी, दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।







