Manikarnika Ghat history: वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, जिसे ‘महाश्मशान’ के रूप में पूजा जाता है, आज एक बार फिर अपने जीर्णोद्धार को लेकर चर्चा में है। पौराणिक मान्यताओं से लेकर ऐतिहासिक संघर्षों तक, इस घाट ने समय के कई थपेड़े सहे हैं। भगवान विष्णु के चक्र-पुष्करिणी कुंड से लेकर रानी अहिल्याबाई होल्कर के सेवा कार्यों तक, इस स्थल का इतिहास अटूट आस्था का प्रतीक है। हालांकि, हालिया विकास कार्यों और कॉरिडोर निर्माण के बीच विरासत के संरक्षण को लेकर स्थानीय लोगों में असंतोष भी देखा जा रहा है। इतिहास गवाह है कि आक्रांताओं के हमलों के बाद भी पेशवा बाजीराव, रानी बैजाबाई और अलवर के महाराजाओं जैसे संरक्षकों ने इस घाट की गरिमा को पुनर्जीवित किया। आज यह स्थल आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन की नई चुनौती का सामना कर रहा है।

पौराणिक जड़ें और धार्मिक महत्व
Manikarnika Ghat की उत्पत्ति का संबंध सीधे महादेव और भगवान विष्णु से है। स्कंद पुराण के काशी खंड और मत्स्य पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ एक कुंड खोदा था और लाखों वर्षों तक तपस्या की थी। यहाँ स्थित विष्णु चरणपादुका मंदिर शैव और वैष्णव परंपराओं के मिलन का जीवंत प्रमाण है। घाट का उत्तरी भाग ‘विष्णु क्षेत्र’ और दक्षिणी भाग ‘शिव क्षेत्र’ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।
ऐतिहासिक हमले और नागा संन्यासियों का शौर्य
वाराणसी हमेशा से बाहरी आक्रांताओं के निशाने पर रहा। 1664 ईस्वी में जब औरंगजेब की सेना ने काशी पर आक्रमण किया, तब नागा संन्यासियों ने मणिकर्णिका की रक्षा के लिए प्राणों की बाहुति दी। इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार, संन्यासियों के कड़े प्रतिरोध के कारण मुगल सेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा था, हालांकि इस संघर्ष में घाट की संरचनाओं को भारी क्षति पहुँची।

मराठा काल और अहिल्याबाई का योगदान
18वीं शताब्दी Manikarnika Ghat के लिए पुनर्जागरण का काल थी:
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पेशवा बाजीराव (1730): इन्होंने घाट और सीढ़ियों का पुनर्निर्माण शुरू कराया। हालांकि, तकनीकी बाधाओं और भूस्खलन के कारण कुछ हिस्सा धंस गया, जिसके अवशेष आज भी दिखाई देते हैं।
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अहिल्याबाई होल्कर (1791): घाट को आधुनिक भव्य स्वरूप देने का श्रेय इंदौर की महारानी अहिल्याबाई को जाता है। उन्होंने न केवल घाट संवारा, बल्कि 1795 में तारकेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। यह मंदिर अपनी पंचायतन शैली और ‘तारक मंत्र’ की मान्यता के कारण मोक्षदायिनी माना जाता है।
रानी बैजाबाई से आधुनिक काल तक
अहिल्याबाई के बाद भी संरक्षण का क्रम जारी रहा:
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रानी बैजाबाई (1830): ग्वालियर की महारानी ने घाट की मरम्मत और आंशिक पुनर्निर्माण कराया।
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महाराजा मंगल सिंह (1895): अलवर के महाराजा ने यहाँ प्रसिद्ध मनोकामेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी स्थापत्य का बेजोड़ नमूना है।
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उत्तर प्रदेश सरकार (1965): आजादी के बाद सरकार ने घाट की व्यापक मरम्मत कराई, जिससे इसे वह स्वरूप मिला जो हम पिछले दशकों से देख रहे थे।
आस्था और बदलाव का संतुलन
Manikarnika Ghat का इतिहास परिवर्तनशील रहा है। आज जब बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर के साथ इसका कायाकल्प किया जा रहा है, तो मुख्य चुनौती इसकी प्राचीन आत्मा और पौराणिक पहचान को अक्षुण्ण रखने की है। यह केवल पत्थर और सीढ़ियों का ढांचा नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है।


