Game of Cross-Voting in Rajya Sabha: हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में कई राज्यों में दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिले। ओडिशा, बिहार और हरियाणा में विधायकों ने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को छोड़कर दूसरे दलों के प्रत्याशियों को वोट डाले। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ओडिशा में बीजेपी के दिलीप राय की जीत में करीब 11 विपक्षी विधायकों ने अहम भूमिका निभाई। इनमें कांग्रेस के तीन विधायक – रमेश जेना, दशरथी गोमांगो और सोफिया फिरदीस शामिल थे। वहीं बीजेपी के ही 8 विधायकों ने भी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार की जगह दिलीप राय को वोट दिया। इस क्रॉस-वोटिंग के दम पर बीजेपी के तीनों प्रत्याशी जीत दर्ज करने में कामयाब रहे।
हरियाणा में क्यों टले नतीजे?
हरियाणा में दो राज्यसभा सीटों के लिए हुए चुनाव में मामला उलझ गया। यहां 90 विधायकों में से सिर्फ 88 ने वोट डाला, जिससे जीत का आंकड़ा 31 से घटकर 30 रह गया। बीजेपी के सभी 48 विधायकों ने वोट डाला, लेकिन असली उलझन तब शुरू हुई जब दो कांग्रेसी विधायकों – भरत सिंह बेनीवाल और परमवीर सिंह – के वोट की गोपनीयता लीक होने की शिकायत बीजेपी ने की। वहीं कांग्रेस ने भी बीजेपी नेता अनिल विज को लेकर ऐसी ही शिकायत दर्ज कराई।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग को पत्र लिखकर प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाया। जांच के बाद चुनाव आयोग ने परमवीर सिंह का वोट रद्द कर दिया, जबकि अनिल विज और भरत सिंह बेनीवाल का वोट वैध माना गया। इस उलझन की वजह से गिनती में देरी हुई और नतीजे रात सवा एक बजे आए, जिसमें बीजेपी के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौध ने जीत दर्ज की।
क्यों नहीं होती क्रॉस-वोटिंग पर कार्रवाई?
अक्सर सवाल उठता है कि विधायक अगर पार्टी लाइन से हटकर वोट करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती? दरअसल, राज्यसभा चुनाव में पार्टी का व्हिप लागू नहीं होता। यहां ओपन वोटिंग का नियम है। विधायक को अपना मतपत्र पार्टी के एजेंट को दिखाना होता है। अगर कोई विधायक ऐसा नहीं करता या किसी और को मतपत्र दिखाता है, तो उसका वोट रद्द हो सकता है। पार्टी विधायक को निकाल भी सकती है, लेकिन इसके लिए स्पीकर को अलग से आवेदन देना होता है। पार्टियां अक्सर राजनीतिक कारणों से ऐसा करने से बचती हैं। गौरतलब है कि 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पैसे के लेन-देन को रोकने के लिए ही ओपन वोटिंग का नियम बनाया था।
सरकार पर क्या होगा असर?
इन नतीजों के बाद राज्यसभा में एनडीए का बहुमत फिर से बन गया है। बीजेपी के 106 सांसदों के साथ एनडीए के कुल 140 सांसद हो गए हैं। अब केंद्र सरकार को कोई बड़ा बिल पास कराने के लिए बीजेडी, वाईएसआरसीपी या निर्दलीयों के सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि, चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि जब एक ही पार्टी के पास दोनों सदनों में बहुमत होता है, तो आम सहमति बनाने की प्रवृत्ति कम हो जाती है, जो लोकतंत्र के लिए उतना स्वस्थ नहीं माना जाता।

