UGC Equity Regulations 2026: UGC ने 13 जनवरी 2026 को “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026” लागू किए हैं, जिनका उद्देश्य कैंपस में जातिगत भेदभाव मिटाना है। इसके तहत ‘Equity Committees’ और ‘Equity Squads’ जैसे कड़े निगरानी तंत्र बनाए गए हैं, जिन्हें न मानने पर संस्थानों की मान्यता रद्द हो सकती है। हालांकि, इन नियमों को लेकर देशभर में विरोध शुरू हो गया है। छात्र और शिक्षक इसे एकतरफा और भेदभावपूर्ण बता रहे हैं, क्योंकि इसमें ‘सामान्य वर्ग’ (General Category) के लिए किसी भी प्रतिनिधित्व या सुरक्षा कवच का प्रावधान नहीं है, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है।
UGC के वो 4 नियम जिन पर मचा है घमासान
इन बदलावों को लेकर सवर्ण समाज और शिक्षक संघों में गहरी नाराजगी है। मुख्य विवाद इन 4 बिंदुओं पर केंद्रित है:
1. ‘Equity Squads’ और निगरानी का साया
नियमों के अनुसार, हर कैंपस में Equity Squads और Equity Ambassadors तैनात होंगे। ये दस्ते हॉस्टल और क्लासरूम में ‘भेदभाव’ की निगरानी करेंगे।
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चिंता: छात्रों का मानना है कि यह कैंपस को ‘निगरानी जेल’ (Surveillance Camp) में बदल देगा। भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा न होने से किसी भी सामान्य बातचीत को गलत तरीके से पेश किया जा सकता है।
2. एकतरफा ‘Equity Committee’ का गठन
हर संस्थान में एक Equity Committee होगी जो शिकायतों पर फैसला लेगी। इसमें SC, ST, OBC, अल्पसंख्यकों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।
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चिंता: सवर्ण समाज के छात्रों का तर्क है कि इस कमेटी में General Category का कोई प्रतिनिधि अनिवार्य नहीं है। ऐसे में निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कम है और यह सवर्णों को ‘स्वघोषित अपराधी’ की तरह देखने वाली व्यवस्था है।
3. ‘झूठी शिकायत’ पर सजा के प्रावधान का न होना
शुरुआती ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने वाले पर कार्रवाई का नियम था, जिसे फाइनल नोटिफिकेशन में हटा दिया गया है।
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चिंता: शिक्षकों और छात्रों को डर है कि इस नियम का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने या करियर खराब करने के लिए किया जा सकता है। बिना सबूत के भी सिर्फ आरोप लगने पर आरोपी का करियर दांव पर लग सकता है।
4. संस्थानों पर ‘मान्यता रद्द’ होने का दबाव
यदि कोई संस्थान इन नियमों को अक्षरशः लागू नहीं करता, तो UGC उसकी मान्यता (Recognition) रद्द कर सकता है या फंड रोक सकता है।
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चिंता: इस कड़े प्रावधान के कारण संस्थान बिना पूरी जांच के ही दबाव में आकर सवर्ण छात्रों या शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं ताकि उनकी खुद की मान्यता बची रहे।
विशेष नोट: बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा और सुप्रीम कोर्ट में दायर PIL इस बात का प्रमाण है कि यह विवाद अब केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी लड़ाई बन चुका है।
