US Exit WHO: 22 जनवरी 2026 को अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से अलग होने की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर पूरी कर ली। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन इस ऐतिहासिक निकास की नींव रखी थी, जिसका उद्देश्य अमेरिका के ‘खून-पसीने की कमाई’ को उन संस्थाओं में जाने से रोकना है जिन्हें वे ‘व्यर्थ’ और ‘अमेरिकी हितों के खिलाफ’ मानते हैं। 78 वर्षों तक संस्थापक सदस्य रहने के बाद अमेरिका का (US Exit WHO) यह कदम वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे के लिए एक बड़ा झटका है। ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि WHO कोविड-19 जैसी महामारियों को रोकने में विफल रहा और राजनीतिक दबाव में काम किया। एक साल के भीतर लगभग 70 संस्थाओं और समझौतों से हटना ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के चरम रूप को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मची खलबली
ट्रंप प्रशासन ने केवल WHO ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ी 31 और अन्य 35 गैर-यूएन संस्थाओं से किनारा कर लिया है। इनमें जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाला IPCC, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), और UN वुमेन जैसी महत्वपूर्ण इकाइयां शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि (US Exit WHO) ये संगठन ‘वोक एजेंडा’ और ऐसी विचारधाराओं को बढ़ावा दे रहे हैं जो अमेरिकी संप्रभुता को सीमित करती हैं।
WHO पर वित्तीय संकट के बादल
अमेरिका WHO का सबसे बड़ा फंड देने वाला देश था। इसके हटने से संगठन को सालाना लगभग 700 मिलियन डॉलर का घाटा होगा। हालांकि WHO का दावा है कि अमेरिका पर बकाया राशि करोड़ों डॉलर में है, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे चुकाने से साफ इनकार कर दिया है। जानकारों का मानना है कि इससे पोलियो उन्मूलन, इबोला नियंत्रण और भविष्य की महामारियों से लड़ने की वैश्विक क्षमता आधी रह जाएगी।
क्या अमेरिका खुद को जोखिम में डाल रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों को छोड़ने से अमेरिका अपना वैश्विक दबदबा (US Exit WHO) खो सकता है। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लॉरेंस गोस्टिन के अनुसार, यह फैसला “विनाशकारी” है क्योंकि संक्रामक बीमारियां सीमाओं को नहीं मानतीं। डेटा शेयरिंग और वैज्ञानिक सहयोग के बिना अमेरिका खुद को भविष्य के स्वास्थ्य खतरों के प्रति संवेदनशील बना रहा है।


