Sapna Choudhary Passport Case: मशहूर स्टेज परफॉर्मर और डांसर सपना चौधरी को सोमवार को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। लखनऊ बेंच ने उनके पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सपना चौधरी का पासपोर्ट 10 साल के लिए नवीनीकृत किया जाए। इस फैसले से सपना चौधरी को न सिर्फ कानूनी राहत मिली है, बल्कि उनके पेशेवर जीवन के लिए भी यह बेहद अहम माना जा रहा है।
याचिका पर हुई विस्तार से सुनवाई
हाईकोर्ट लखनऊ बेंच में सपना चौधरी की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई। इस याचिका में 30 जून 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें पासपोर्ट नवीनीकरण और विदेश यात्रा की अनुमति यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि यात्रा की अवधि, देश और उद्देश्य से जुड़े जरूरी दस्तावेज नहीं दिए गए हैं। सपना चौधरी की तरफ से दलील दी गई कि वह एक जानी-मानी कलाकार हैं और उन्हें देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी कार्यक्रमों के लिए बुलावा आता रहता है।
पासपोर्ट न होने से आजीविका पर असर
सपना चौधरी की ओर से अदालत को बताया गया कि विदेश में होने वाले कार्यक्रमों के लिए वैध पासपोर्ट होना जरूरी है। पासपोर्ट न मिलने की वजह से उनके काम पर सीधा असर पड़ रहा है और उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। वकील ने यह भी बताया कि सपना चौधरी के खिलाफ साल 2018 में लखनऊ के आशियाना थाने में एक मामला दर्ज हुआ था, जिसमें उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी है। उस जमानत आदेश में विदेश यात्रा पर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई गई है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब किसी व्यक्ति को जमानत मिल चुकी हो और विदेश जाने पर कोई पाबंदी न हो, तब सिर्फ लंबित आपराधिक मामले के आधार पर पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार करना गलत है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 और 19 का उल्लंघन बताया, जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े हैं।
फरार होने की कोई आशंका नहीं
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि किसी कलाकार या आम नागरिक को अनिश्चित समय तक पासपोर्ट से वंचित रखना सही नहीं है, जब उसके फरार होने की कोई आशंका नहीं हो। अदालत ने माना कि सपना चौधरी की सामाजिक पहचान, पारिवारिक जिम्मेदारियां और भारत में स्थायी निवास इस बात को साबित करता है कि वह भागने का जोखिम नहीं रखती हैं।
कलाकारों के लिए अहम फैसला
इस फैसले को सिर्फ सपना चौधरी के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य कलाकारों और आम नागरिकों के लिए भी अहम माना जा रहा है। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि कानूनी प्रक्रिया के नाम पर किसी के मौलिक अधिकारों को बेवजह नहीं छीना जा सकता।


