Ghaziabad Minor Girls Suicide Case: गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या ने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बच्चियों ने जान क्यों दी, बल्कि यह भी है कि वे स्कूल क्यों नहीं जा पा रही थीं। क्या वजह पढ़ाई में मन न लगना थी, या महंगी स्कूल फीस और परिवार की सीमित कमाई? इस दर्दनाक घटना के पीछे कई ऐसे पहलू हैं, जो धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं।
स्कूल से दूरी, एक बड़ा कारण?
पुलिस जांच और आसपास के लोगों की बातचीत में यह बात सामने आई है कि कोरोना काल के बाद से तीनों बच्चियां स्कूल नहीं जा रही थीं। बताया जा रहा है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। निजी स्कूल की बढ़ती फीस और रोजमर्रा के खर्चों के बीच पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं था।
कुछ लोगों का कहना है कि बच्चियां पढ़ना चाहती थीं, लेकिन हालात उनके खिलाफ थे। स्कूल न जाना उनके मन पर बोझ बनता गया। धीरे-धीरे वे खुद को बाकी बच्चों से अलग महसूस करने लगीं।
सीमित कमाई और बढ़ता दबाव
परिवार की आमदनी सीमित थी। घर चलाना, किराया, खाना और दूसरी जरूरतें पूरी करना ही मुश्किल हो रहा था। ऐसे में महंगी पढ़ाई एक अतिरिक्त दबाव बन गई।
मोहल्ले के लोगों के अनुसार, बच्चियों के माता-पिता भी तनाव में रहते थे। बच्चों ने यह सब देखा और महसूस किया। कई बार बच्चे बिना कुछ कहे ही घर की परेशानियों को अपने मन में बैठा लेते हैं, और वही चुपचाप उन्हें तोड़ देता है।
पढ़ाई नहीं, बल्कि मानसिक अकेलापन?
कुछ जानकारों का मानना है कि मामला सिर्फ पढ़ाई या फीस का नहीं था। स्कूल न जाने से बच्चियां दोस्तों से कट गई थीं। उनका दिन ज्यादातर घर में, मोबाइल और ऑनलाइन दुनिया में गुजरने लगा।
यही वह समय होता है जब बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाते हैं। उन्हें कोई समझाने वाला, सुनने वाला चाहिए होता है। अगर यह सहारा न मिले, तो गलत फैसले लेने का खतरा बढ़ जाता है।
लोगों की बातचीत में क्या निकलकर आया?
सोसायटी के लोगों ने बताया कि तीनों बच्चियां शांत स्वभाव की थीं। ज्यादा किसी से बात नहीं करती थीं। कई बार उन्हें उदास देखा गया, लेकिन किसी ने अंदाजा नहीं लगाया कि उनके मन में इतना बड़ा तूफान चल रहा है।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बच्चों पर पढ़ाई, हालात और भविष्य का दबाव धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि वे उससे निकलने का रास्ता नहीं देख पाईं।
यह घटना क्या सिखाती है?
यह मामला हमें याद दिलाता है कि बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनकी मानसिक हालत पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। स्कूल न जाना, अकेलापन, आर्थिक तंगी, ये सभी मिलकर एक बड़ा खतरा बन सकते हैं।
जरूरत है समय पर बात करने की, बच्चों को समझने की और यह महसूस कराने की कि हर समस्या का हल मौत नहीं होता।
