Health News: लंबे समय से माना जाता रहा है कि बाजार में उपलब्ध प्रोबायोटिक्स हर व्यक्ति के लिए समान रूप से फायदेमंद होते हैं। लेकिन भारतीयों की आंतों पर हुई एक नई रिसर्च ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। पुणे स्थित नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (NCCS) और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने भारत की कुछ जनजातीय आबादी के गट माइक्रोबायोम का अध्ययन किया।
रिसर्च में ऐसे बैक्टीरिया और उनके स्ट्रेन्स की पहचान हुई, जो इन भारतीय समुदायों की आंतों में पाए गए, लेकिन पश्चिमी आबादी में बहुत कम या अलग रूप में देखे जाते हैं।
खानपान से बदलता है गट माइक्रोबायोम
हमारे पाचन तंत्र में मौजूद बैक्टीरिया हमारे खानपान और जीवनशैली से गहराई से प्रभावित होते हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक आहार का असर भी आंतों में मौजूद माइक्रोब्स पर पड़ता है।
स्टडी में यह संकेत मिला कि कुछ भारतीय गट बैक्टीरिया स्थानीय भोजन में मौजूद जौ, गेहूं और डेयरी जैसे खाद्य पदार्थों से जुड़े पोषक तत्वों के उपयोग के लिए अनुकूलित हो सकते हैं। यही वजह है कि अलग-अलग आबादी के गट माइक्रोबायोम में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिल सकता है।
क्या विदेशी प्रोबायोटिक्स भारतीयों के लिए बेअसर हैं?
इस रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि विदेशों में विकसित सभी प्रोबायोटिक्स भारतीयों के लिए बेअसर हैं। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक प्रोबायोटिक्स का असर व्यक्ति के गट माइक्रोबायोम, खानपान और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।
किसी व्यक्ति को प्रोबायोटिक लेने के बाद फायदा मिल सकता है, जबकि दूसरे व्यक्ति को खास लाभ न मिले या गैस और पेट फूलने जैसी परेशानी महसूस हो सकती है। इसलिए केवल विज्ञापन देखकर कोई सप्लीमेंट लेना उचित नहीं है।
क्या खाना हो सकता है ज्यादा फायदेमंद?
विशेषज्ञों की सलाह है कि आंतों की सेहत के लिए फाइबर से भरपूर और विविध आहार को प्राथमिकता दी जाए। दालें, साबुत अनाज, सब्जियां, फल और पारंपरिक फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं।
हालांकि, किसी बीमारी या लगातार पाचन संबंधी समस्या में प्रोबायोटिक सप्लीमेंट शुरू करने से पहले डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।
