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China Oil Shock: क्या चीन की कम तेल खरीद से भारत को मिली राहत, लेकिन खतरा अभी टला नहीं

Oil Shock: पश्चिम एशिया में तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए तेल सप्लाई पर बने दबाव के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अनुमान के मुताबिक तेजी से नहीं बढ़ीं। इसकी एक अहम वजह चीन की ओर से क्रूड की खरीद में आई कमी मानी जा रही है। दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक चीन इस समय सामान्य स्तर की तुलना में कम तेल खरीद रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध क्रूड की मात्रा बढ़ी है और भारत जैसे दूसरे एशियाई खरीदारों को भी कुछ राहत मिली है। चीन की कमजोर मांग ने फिलहाल ग्लोबल ऑयल मार्केट पर दबाव को कुछ हद तक संभालने का काम किया है।

रिजर्व से चल रहा काम

चीन में कच्चे तेल की खपत और रिफाइनिंग गतिविधियों में भी कमी देखने को मिली है। रिपोर्ट के अनुसार, मई में चीन का क्रूड इंपोर्ट लगभग 6.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। यह आंकड़ा 2016 के बाद के निचले स्तरों में शामिल है। ऐसे समय में चीन अपनी घरेलू तेल इन्वेंट्री और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का इस्तेमाल कर रहा है। इससे तत्काल जरूरतों के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार से ज्यादा मात्रा में क्रूड खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ रही। यही रणनीति अभी वैश्विक बाजार में तेल की अतिरिक्त मांग को रोक रही है।

भारत को मिला फायदा

चीन की तरफ से कम तेल खरीदने का फायदा भारत समेत एशिया के दूसरे बड़े तेल आयातकों को भी मिला है। चीन की कम मांग के कारण रूस, अफ्रीका और अमेरिका से आने वाले क्रूड की कुछ खेप दूसरे खरीदारों के लिए उपलब्ध हुई हैं। भारत ने भी अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने की कोशिश तेज की है। रूसी और वेनेजुएला के क्रूड की खरीद में बढ़ोतरी इसी रणनीति का हिस्सा रही। इससे भारत को सप्लाई बनाए रखने में मदद मिली और पश्चिम एशिया संकट के बीच अचानक तेल की कमी का जोखिम कुछ कम हुआ।

राहत के साथ बढ़ा खर्च

हालांकि चीन की कम मांग से भारत को सप्लाई के मोर्चे पर राहत जरूर मिली है, लेकिन महंगे कच्चे तेल का असर भारत के आयात बिल पर साफ दिखाई दे रहा है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 89 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से खरीदता है। अप्रैल-जून तिमाही में देश का क्रूड इंपोर्ट बिल सालाना आधार पर 61.2 प्रतिशत बढ़कर लगभग 49.8 अरब डॉलर हो गया। खास बात यह है कि यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई, जब आयात की मात्रा में कमी दर्ज की गई। यानी कम मात्रा में तेल खरीदने के बावजूद भारत को ज्यादा भुगतान करना पड़ा।

असली खतरा अभी बाकी

फिलहाल चीन की कमजोर मांग भारत और दूसरे तेल आयातकों के लिए राहत जैसी है, लेकिन यही स्थिति आगे बड़ी चुनौती भी बन सकती है। अगर चीन अपने रणनीतिक भंडार से इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा भरने के लिए बड़े पैमाने पर क्रूड खरीदना शुरू करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग अचानक बढ़ सकती है। दूसरी तरफ, अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हुई, तो उपलब्ध क्रूड पर दबाव और बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत फिर तेजी पकड़ सकती है। इसका सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल, महंगाई और रुपये की कीमत पर पड़ने की आशंका रहेगी। इसलिए चीन की मौजूदा कम खरीद भारत के लिए स्थायी राहत नहीं, बल्कि फिलहाल मिली एक अस्थायी राहत है।

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