सपा ने फिर खेला PDA दाव… इतने मुस्लिम और दलित को बनाया उम्मीदवार, क्या होगा उपचुनावों में हाल?

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) ने आगामी उपचुनावों के लिए 10 में से 6 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है। इस कदम ने कांग्रेस को झटका दिया है, जबकि सपा ने ओबीसी, मुस्लिम और दलित नेताओं को टिकट देकर सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है।

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Lucknow: उत्तर प्रदेश में आगामी उपचुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए 10 में से 6 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इस कदम से सपा ने न केवल चुनावी रणनीति को मजबूत किया है, बल्कि अपने कोर वोटबैंक को भी साधने का प्रयास किया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि सपा की यह उम्मीदवारों की सूची कांग्रेस के लिए एक आश्चर्य के रूप में आई है, जिससे दोनों दलों के बीच संबंधों में और तनाव उत्पन्न हो सकता है।

सपा की उम्मीदवारों की सूची में विविधता

समाजवादी पार्टी ने जिन 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें से 3 ओबीसी, 2 मुस्लिम और 1 दलित नेता शामिल हैं। इस बार अखिलेश यादव ने तीन पिछड़ी जातियों (यादव, कुर्मी और बिंद) के नेताओं को टिकट देकर सामाजिक संतुलन बनाने का प्रयास किया है। करहल से तेज प्रताप यादव, कटेहरी से शोभावती वर्मा, और मझवा से ज्योति बिंद को उम्मीदवार बनाया गया है।

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मुस्लिम समुदाय से सीसामऊ से नसीम सोलंकी और फूलपुर से मुस्तफा (Lucknow) सिद्दीकी का नाम शामिल है, जबकि दलित समाज से अजीत प्रसाद को मिल्कीपुर से उम्मीदवार बनाया गया है। अजीत प्रसाद, सपा के वरिष्ठ नेता अवधेश प्रसाद के बेटे हैं, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मात देकर महत्वपूर्ण जीत हासिल की थी।

उपचुनाव की सीटें और कारण

उत्तर प्रदेश में उपचुनाव (Lucknow) के लिए जिन 10 विधानसभा सीटों पर चुनाव होना है, उनमें कटेहरी (अंबेडकर नगर), करहल (मैनपुरी), मिल्कीपुर (अयोध्या), मीरापुर (मुजफ्फरनगर), गाजियाबाद, मझवां (मिर्जापुर), सीसामऊ (कानपुर नगर), खैर (अलीगढ़), फूलपुर (प्रयागराज), और कुंदरकी (मुरादाबाद) शामिल हैं। इनमें से नौ सीटें लोकसभा चुनाव में सपा विधायकों के सांसद चुने जाने के कारण खाली हुई हैं, जबकि सीसामऊ सीट सपा के इरफान सोलंकी की आपराधिक मामले में सजा होने के कारण खाली हुई है।

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इस चुनाव में सपा की यह रणनीति न केवल अपने पारंपरिक वोटबैंक को बनाए रखने का प्रयास है, बल्कि यह कांग्रेस को भी अपनी ताकत का एहसास कराने का एक तरीका है। सपा के इस कदम से आगामी चुनावों की दिशा में दिलचस्पी और बढ़ गई है।

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