Prayagraj history: इलावर्त से प्रयागराज तक… एक इस नगर का ऐतिहासिक सफर

प्रयागराज, जिसे इलावर्त, इलाहाबाद और अन्य नामों से जाना गया, गंगा-यमुना संगम के साथ वैदिक, मुगल और आधुनिक काल की ऐतिहासिक धरोहर समेटे है। यह आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

Prayagraj

Prayagraj history: प्रयागराज, जिसे इलावर्त, इलाबास, और इलाहाबाद जैसे विभिन्न नामों से जाना गया है, भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। यह भूमि न केवल पवित्र संगम की गवाही देती है, बल्कि भारत के वैदिक युग, मुगलकाल और आधुनिक युग की अद्भुत गाथा भी समेटे हुए है। इस लेख में हम प्रयागराज के नाम परिवर्तन और उससे जुड़े ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पहलुओं को विस्तार से जानेंगे। महाकुंभ-2025 के आयोजन के बीच इस ऐतिहासिक नगरी की कहानी आज भी इसकी विरासत का अहसास कराती है।

वैदिक युग और इलावर्त

प्रयागराज (Prayagraj) का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद के दशम मंडल में मिलता है। इसमें कहा गया है कि जो लोग गंगा और यमुना के संगम पर स्नान करते हैं, वे स्वर्गलोक की प्राप्ति करते हैं। वैदिक काल में यह स्थान इलावर्त के नाम से भी जाना जाता था। ऐसा माना जाता है कि यह क्षेत्र ‘इलावंशीय’ राजाओं के अधीन था, जो मध्य हिमालय से यहां आकर बसे थे। राजा इला ने प्रतिष्ठानपुर (झूंसी) को अपनी राजधानी बनाया।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गंगा-यमुना का यह संगम न केवल जलधाराओं का मिलन है, बल्कि आस्था और संस्कृति का भी प्रतीक है। संगम की पवित्रता और प्रयागराज की महिमा ने इसे वैदिक काल से ही तीर्थराज का दर्जा दिलाया।

मुगलकाल और ‘इलाहावास’ 

मुगलकाल में प्रयागराज (Prayagraj) को एक नए रूप में देखा गया। सम्राट अकबर ने गंगा-यमुना के संगम की महत्ता को समझते हुए 1575 ईस्वी में यहां ‘इलाहावास’ नामक नगर की नींव रखी। यह नाम बाद में ‘अल्लाहबाद’ और फिर ‘इलाहाबाद’ के रूप में प्रचलित हुआ।

इतिहासकार बदायूंनी ने लिखा है कि अकबर को इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति बेहद पसंद आई। यह क्षेत्र कृषि, व्यापार और प्रशासन के लिए उपयुक्त था। अकबर ने यहां एक बड़ा किला बनवाया, जिसे आज भी इलाहाबाद किले के नाम से जाना जाता है। जहांगीर ने भी इस नगर को अपने प्रशासन का केंद्र बनाया।

शाहजहां और इलाहाबाद 

शाहजहां के शासनकाल में ‘इलाहावास’ को ‘इलाहाबाद’ नाम दिया (Prayagraj) गया। उनके पुत्र दारा शिकोह के नाम पर दारागंज मोहल्ला आज भी इस ऐतिहासिक बदलाव की गवाही देता है। शाहजहां के समय में प्रयागराज एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र बन चुका था।

ब्रिटिश काल और नई पहचान

18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन के साथ प्रयागराज पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। 11 नवंबर 1801 को गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली ने इसे अवध के नवाब से छीन लिया। इसके बाद प्रयागराज ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रमुख भूमिका निभाई।

आधुनिक काल और प्रयागराज

2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर ‘प्रयागराज’ कर दिया। यह कदम इस शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को फिर से स्थापित करने का प्रयास था। आज महाकुंभ-2025 के आयोजन के दौरान यह शहर अपनी विरासत और आस्था की अद्भुत छटा बिखेर रहा है।

प्रयागराज का इतिहास केवल नामों का बदलाव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक धारा का प्रतीक है। यह नगरी प्राचीन काल से आधुनिक युग तक हर युग की गाथा सुनाती है। चाहे वह वैदिक युग का इलावर्त हो, मुगलकाल का इलाहाबाद, या आधुनिक प्रयागराज, यह भूमि हर बार अपनी विरासत के साथ पुनर्जीवित होती रही है।

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