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Prayagraj : कुंभ मेला इन अखाड़ों के बिना अधूरा ,जानिए अखाड़ों का इतिहास और महत्व

महाकुंभ के 13 पारंपरिक अखाड़े मेले की शोभा बढ़ाते हैं।इनमें 7 शैव अखाड़े, 3 वैष्णव अखाड़े और 3 सिख अखाड़े शामिल हैं। हर अखाड़े का अपना इतिहास हैं।

SYED BUSHRA by SYED BUSHRA
January 15, 2025
in प्रयागराज, महाकुंभ 2025
Maha Kumbh 2025 Akharas
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MahaKumbh 2025 कुंभ मेले का जिक्र हो और अखाड़ों का नाम न आए, यह मुमकिन नहीं। कुंभ की रौनक इन्हीं अखाड़ों के साधु संतों से होती है। इनमें नागा साधु भी शामिल होते हैं, जिनकी साधना और जीवनशैली लोगों को चौंका देती है। वर्तमान में मान्यता प्राप्त 13 अखाड़े हैं। इनमें 7 शैव अखाड़े, 3 वैष्णव अखाड़े और 3 सिख अखाड़े शामिल हैं। आइए, इन अखाड़ों के इतिहास और उनकी विशेषताओं को जानते हैं।

निरंजनी अखाड़ा (शैव)

यह सबसे बड़ा शैव अखाड़ा है। इसकी स्थापना 904 ई. में गुजरात के मांडवी में हुई ऐसा माना जाता है। इसके इष्टदेव भगवान कार्तिकेय हैं। यहां सबसे ज्यादा पढ़े लिखे साधु संत हैं, जिन्होंने बड़े पदों को त्यागकर साधु जीवन चुना। इसके वर्तमान आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज हैं।

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महानिर्वाणी अखाड़ा (शैव)

महानिर्वाणी अखाड़े का केंद्र हरिद्वार के कनखल में है। इसकी शाखाएं उज्जैन, काशी और ओंकारेश्वर में भी हैं। इसकी स्थापना आठ संतों ने की थी। इस अखाड़े के इष्टदेव भगवान कपिल हैं। वर्तमान में इसके आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी हरिहरानंद महाराज हैं।

आवाहन अखाड़ा (शैव)

यह अखाड़ा धर्म रक्षा के लिए 547 ई. में स्थापित हुआ। इसका मुख्यालय काशी में है। इसके इष्टदेव भगवान गणेश और दत्तात्रेय हैं। यहां 12,000 से अधिक नागा साधु हैं। वर्तमान आचार्य महामंडलेश्वर अरुण गिरि महाराज हैं।

जूना अखाड़ा (शैव)

जूना अखाड़ा पहले भैरव अखाड़ा कहलाता था। इसकी स्थापना 1145 ई. में कर्णप्रयाग में हुई थी। इसके साधु शस्त्र चलाने में निपुण होते हैं। इसका मुख्यालय वाराणसी के हनुमान घाट पर है। वर्तमान आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज हैं।

अटल अखाड़ा (शैव)

अटल अखाड़े की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। इसका केंद्र काशी में है। इसके इष्टदेव भगवान गणेश हैं। इसका नाम ‘अटल’ इसलिए पड़ा क्योंकि यह कभी अपने धर्म मार्ग से विचलित नहीं होता। इसके आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती हैं।

आनंद अखाड़ा (शैव)

आनंद अखाड़े की स्थापना विक्रम संवत 856 में महाराष्ट्र के बरार में हुई थी। इस अखाड़े के इष्टदेव सूर्य हैं। यहां नागा साधु बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन है। इसके आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद गिरि महाराज हैं।

अग्नि अखाड़ा (शैव)

अग्नि अखाड़े का केंद्र गिरनार की पहाड़ी पर है। यहां के साधु नर्मदा नदी के पास रहते हैं। इनकी आराध्या मां गायत्री हैं। इस अखाड़े के ब्रह्मचारी चार भागों में बंटे होते हैं। वर्तमान आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्मर्षि रामकृष्णानंद जी महाराज हैं।

दिगंबर अखाड़ा (वैष्णव)

यह वैष्णवों का सबसे पुराना अखाड़ा है। इसकी स्थापना अयोध्या में हुई थी। इसके साधु सफेद वस्त्र पहनते हैं और भगवान राम व कृष्ण की पूजा करते हैं। इसके श्रीमहंत वैष्णव दास हैं।

निर्वाणी अखाड़ा (वैष्णव)

निर्वाणी अखाड़े की स्थापना संत अभयरामदासजी ने की थी। इसके चार विभाग हैं हरद्वारी, वसंतिया, उज्जैनिया और सागरिया। इसका मुख्यालय अयोध्या और वृंदावन में है। इसके श्रीमहंत धर्मदासजी महाराज हैं।

निर्मोही अखाड़ा (वैष्णव)

निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 ई. में हुई। इसका मुख्यालय वाराणसी में है। यह अखाड़ा भगवान राम की पूजा करता है। यहां के साधु शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण होते हैं। इसके श्रीमहंत राजेंद्र दास महाराज हैं।

निर्मल अखाड़ा (सिख)

निर्मल अखाड़ा सिखों का प्रमुख अखाड़ा है। इसकी स्थापना 1862 में बाबा महताब सिंह ने की थी। इसका मुख्यालय हरिद्वार के कनखल में है। यहां सुबह गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ होता है। इसके श्रीमहंत ज्ञान सिंह जी हैं।

बड़ा उदासीन अखाड़ा (सिख)

इसकी स्थापना 1825 ई. में हुई। इसका मुख्यालय हरिद्वार में है। यह गुरू नानक देव के पुत्र श्री चंददेव को मानता है। इसके मुखिया राम नौमी दास महाराज हैं।

नया उदासीन अखाड़ा

यह अखाड़ा 1913 में स्थापित हुआ। इसका केंद्र हरिद्वार के कनखल में है। यहां केवल संगत साहब की परंपरा के साधु शामिल होते हैं।

किन्नर अखाड़ा

किन्नर अखाड़ा 2015 में अस्तित्व में आया। इसकी स्थापना लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की। इसे जूना अखाड़े का हिस्सा माना जाता है।

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