राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने शुरुआती सेवाकाल से जुड़ा एक बेहद जोखिम भरा खुफिया मिशन साझा किया है। उन्होंने बताया कि एक समय उनके तैयार किए गए भारतीय फील्ड एजेंट चीन की सीमा के पास चीनी सेना और विद्रोही तत्वों के हाथों पकड़े गए थे। उस समय उन्हें लगा था कि उनका करियर और साख दोनों खत्म हो सकते हैं।
पूर्वोत्तर में था खतरा
यह घटना उस दौर की बताई गई है, जब पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद और सीमा पार से मिलने वाली मदद बड़ी सुरक्षा चुनौती थी। विद्रोही गुटों के लड़ाके म्यांमार और चीन की सीमा के पार जाकर हथियारों और सैन्य प्रशिक्षण की व्यवस्था करते थे।
उस समय डोभाल इंटेलिजेंस ब्यूरो में युवा फील्ड अधिकारी के तौर पर काम कर रहे थे। उन्हें सीमा पार सक्रिय विद्रोही नेटवर्क, हथियारों की सप्लाई और उनके संपर्कों की जानकारी जुटाने का जिम्मा मिला था।
एजेंटों को भेजा था
डोभाल ने सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय संपर्कों के जरिए अपना नेटवर्क तैयार किया। इन लोगों को जरूरी जानकारी देकर सीमा पार भेजा गया था, ताकि वे विद्रोही कमांडरों और चीनी सैन्य अधिकारियों के बीच संपर्क, हथियारों की जानकारी और आवाजाही के रास्तों के बारे में सूचनाएं जुटा सकें।
शुरुआत में मिशन योजना के मुताबिक आगे बढ़ रहा था। लेकिन अचानक चीनी सेना और स्थानीय उग्रवादी कैडरों को इन लोगों की गतिविधियों पर शक हो गया। इसके बाद उनके संपर्क टूट गए और रेडियो सिग्नल भी बंद हो गए।
गिरफ्तारी से मचा हड़कंप
जब मुख्यालय को जानकारी मिली कि भारतीय फील्ड ऑपरेटिव्स पकड़े गए हैं और उनसे पूछताछ हो रही है, तो डोभाल के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया।
उन्होंने इस घटना को याद करते हुए बताया कि वह उनके जीवन की सबसे लंबी और डरावनी रात थी। उन्हें डर था कि अगर एजेंट पूछताछ में भारतीय खुफिया नेटवर्क के बारे में जानकारी दे देते हैं, तो मिशन के साथ उनकी नौकरी और प्रतिष्ठा भी खतरे में पड़ सकती है।
डोभाल के मुताबिक, उस समय उनके मन में यही चल रहा था कि उनका करियर पूरी तरह खत्म हो गया है। साथ ही उन लोगों की जान भी खतरे में थी, जिन्होंने उनके भरोसे पर सीमा पार जाकर काम किया था।
बैकचैनल से निकाला रास्ता
डोभाल ने घबराने के बजाय एक वैकल्पिक योजना तैयार की। उन्होंने स्थानीय संपर्कों और अपने बैकअप चैनलों को सक्रिय किया। कोशिश की गई कि पकड़े गए लोग खुद को सामान्य स्थानीय व्यापारी या ग्रामीण बताते रहें और भारतीय खुफिया तंत्र से उनका कोई संबंध सामने न आए।
स्थानीय स्तर पर ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई कि चीनी अधिकारियों को यह लगे कि ये लोग किसी जासूसी मिशन का हिस्सा नहीं थे, बल्कि गलती से प्रतिबंधित इलाके में पहुंच गए थे।
बताया गया कि बैकचैनल संपर्कों और रणनीतिक प्रयासों के बाद एजेंटों को गंभीर नुकसान के बिना सुरक्षित वापस निकालने में सफलता मिली।
जोखिम से मिली सीख
डोभाल का यह संस्मरण बताता है कि खुफिया अभियानों में सफलता केवल योजना बनाने से नहीं मिलती। कई बार एजेंटों की पहचान सामने आने, संपर्क टूटने या गिरफ्तारी जैसी परिस्थितियों में तत्काल फैसले लेने पड़ते हैं।
पूर्वोत्तर में उग्रवाद और सीमा पार नेटवर्क से निपटने के दौरान सामने आए ऐसे अनुभवों को भारत के सुरक्षा तंत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मौजूदा समय में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर तनाव के बीच भी सीमा से जुड़ी खुफिया जानकारी की अहमियत बनी हुई है।
डोभाल ने युवाओं और भावी अधिकारियों के लिए यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों को व्यक्तिगत लाभ और करियर से ऊपर देशहित को प्राथमिकता देनी पड़ती है। उनके मुताबिक रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए जोखिम उठाने और मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की क्षमता जरूरी है।

