Singhast 2028: सिंहस्थ महाकुंभ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी दौरान खड़े हनुमान जी के मंदिर का ढांचा हटाया गया, लेकिन प्रतिमा को अपनी जगह से हटाना आसान नहीं रहा। स्थानीय लोगों के मुताबिक प्रशासन ने मशीनों और हाइड्रोलिक उपकरणों की मदद से चार दिनों में चार बार प्रयास किया, लेकिन हर बार कोशिश नाकाम रही। मंदिर का ढांचा हटने के बाद प्रतिमा को फिलहाल कैनोपी टेंट से सुरक्षित रखा गया है। श्रद्धालु इसे भगवान की इच्छा और दैवीय संकेत मान रहे हैं, जबकि प्रशासन तकनीकी वजहों को समझने की कोशिश कर रहा है।
जमीन में गहरी जड़ें?
प्रतिमा के नहीं हिलने के पीछे उसकी मजबूत नींव एक बड़ी वजह हो सकती है। जमीन के ऊपर दिखाई देने वाली प्रतिमा करीब 8 फुट ऊंची है, लेकिन इसके नीचे कितना हिस्सा जमीन में मौजूद है, इसकी पुख्ता जानकारी अभी नहीं है। मंदिर के पुजारी पंडित महेश बैरागी के अनुसार, आसपास करीब डेढ़ फुट तक खुदाई करके आधार संरचना समझने का प्रयास किया गया था, लेकिन इससे भी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई। आशंका है कि प्रतिमा किसी गहरी और मजबूत संरचना से जुड़ी हो सकती है। अगर यह मजबूत बेसाल्ट पत्थर से बनी है, तो सीधे खींचने से उसे नुकसान पहुंचने का खतरा भी हो सकता है।
उम्र पर बड़ा सवाल
खड़े हनुमान जी के मंदिर को स्थानीय स्तर पर करीब 170 साल पुराना बताया जाता है और इसका संबंध 1857 के आसपास के दौर से जोड़ा जाता है। हालांकि प्रतिमा की वास्तविक उम्र को लेकर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। अब पुरातत्व विभाग की टीम भी मामले की जांच कर रही है। कुछ स्थानीय दावे इस प्रतिमा को परमार वंश और राजा भोज के काल से जोड़ते हैं। यदि पुरातात्विक जांच में इसके समर्थन में ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो प्रतिमा के एक हजार साल तक पुरानी होने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है।
सिंदूर से छिपा इतिहास
प्रतिमा की जांच में एक बड़ी चुनौती उस पर चढ़ी सिंदूर की मोटी परत भी है। वर्षों से सिंदूर चढ़ाए जाने के कारण प्रतिमा की मूल बनावट, शिल्प शैली और चेहरे की बारीक विशेषताओं को देखना मुश्किल है। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के मुताबिक, अगर प्रतिमा बेसाल्ट पत्थर की बनी है तो यह मालवा की प्राचीन मूर्तिकला से जुड़ी अहम कड़ी हो सकती है। इसलिए इसकी उम्र और निर्माण काल जानने के लिए वैज्ञानिक और पुरातात्विक जांच बेहद जरूरी है।
आस्था बनाम तकनीक
अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि सड़क चौड़ीकरण का काम भी आगे बढ़े और प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान भी न हो। इसके लिए ग्राउंड स्कैनिंग जैसी तकनीक के इस्तेमाल की तैयारी की जा रही है, ताकि जमीन के भीतर मौजूद आधार संरचना की जानकारी मिल सके। दूसरी ओर श्रद्धालु और कई हिंदू संगठन प्रतिमा को हटाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि किसी भी कार्रवाई से पहले प्रतिमा की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। ऐसे में सती गेट का यह मामला अब सिर्फ सड़क चौड़ीकरण तक सीमित नहीं है। सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच प्रशासन के सामने विकास के साथ धार्मिक आस्था और संभावित ऐतिहासिक विरासत को बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।
