New Law on Election Commissioners Appointment: मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि देश में जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह अपना रुख बदल लेती है। कोर्ट ने इसे “बहुमत की तानाशाही” जैसा बताया।
सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई उस याचिका पर हो रही थी, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI को बाहर रखने वाले कानून को चुनौती दी गई है। वरिष्ठ वकील Prashant Bhushan ने अदालत में कहा कि यह कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
अदालत ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान जस्टिस Dipankar Datta ने कहा कि जो भी सरकार सत्ता में आती है, वही ऐसा करती है। उन्होंने कहा कि यह देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है। वहीं जस्टिस Satish Chandra Sharma ने भी कहा कि यह “बहुमत की
तानाशाही” जैसा मामला है।
प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि पहले विपक्ष में रहते हुए कई नेताओं ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों में सरकार के ज्यादा दखल का विरोध किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही लोग अपनी पुरानी बात भूल गए।
चुनाव आयोग की आजादी पर बहस
भूषण ने दलील दी कि संसद को ऐसा कानून बनाना चाहिए था, जिसमें सरकार का पूरा नियंत्रण न हो। उनका कहना था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की सबसे बड़ी जरूरत हैं और यह संविधान के अनुच्छेद 14 से भी जुड़ा मामला है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल फैसले में साफ कहा गया था कि नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। लेकिन नया कानून उसी कमी को दोबारा वापस लेकर आया है, जिसे अदालत पहले गलत बता चुकी है।
विपक्ष के निलंबन का भी उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि जब संसद में यह कानून पास हुआ, तब विपक्ष के कई सांसद निलंबित थे। AIMIM सांसद Asaduddin Owaisi का हवाला देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि विपक्ष के 95 सांसदों को सस्पेंड कर दिया गया था और फिर कानून को वॉयस वोट से पास कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि इतने अहम कानून पर ठीक से चर्चा ही नहीं हुई। सरकार ने सिर्फ इतना कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून बनाने को कहा था, इसलिए नया कानून बना दिया गया।
डॉ. अंबेडकर का भी हुआ जिक्र
सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने B. R. Ambedkar का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान लागू होने के कुछ साल बाद ही अंबेडकर ने कहा था कि देश में लोकतंत्र सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। उन्होंने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि काश जजों की नियुक्ति में भी इतनी तेजी दिखाई जाती, जितनी तेजी से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गई।
एक दिन में 200 नाम कैसे जांचे जाते?
वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने अदालत को बताया कि 2024 में नए कानून के तहत नियुक्तियां बहुत जल्दबाजी में की गईं। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेता को करीब 200 नामों की सूची सिर्फ एक दिन पहले दी गई और अगले ही दिन चयन समिति ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के नाम तय कर दिए।
इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर कोई नेता इतनी जल्दी इतने नामों की जांच कैसे कर सकता है।
