Live-in Relationship: शादी नहीं, फिर भी मिलेगी कानूनी सुरक्षा; महिलाओं पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रूरता केवल शादीशुदा रिश्तों तक सीमित नहीं है। विवाह जैसी प्रकृति वाले लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी कानून के तहत सुरक्षा और न्याय पाने का अधिकार मिलेगा।

Live-in Relationship: सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी महिला के साथ होने वाली क्रूरता यह देखकर तय नहीं की जा सकती कि वह शादीशुदा है या नहीं। यदि कोई महिला ऐसे लिव-इन संबंध में रह रही है, जिसकी प्रकृति विवाह जैसी है, तो उसे भी कानून के तहत सुरक्षा और न्याय पाने का अधिकार होगा। कोर्ट ने माना कि समय के साथ समाज में रिश्तों की प्रकृति बदली है और कानून को भी इन्हीं बदलावों के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए। इस फैसले को महिलाओं की कानूनी सुरक्षा के दायरे को और मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है।

कानून का मकसद महिलाओं की सुरक्षा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 का मूल उद्देश्य महिलाओं को घरेलू क्रूरता और प्रताड़ना से बचाना है। इसलिए केवल इस आधार पर किसी महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने विवाह नहीं किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि लिव-इन संबंध विवाह जैसी प्रकृति का है और उसमें दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं, तो ऐसे मामलों में महिला को भी कानूनी संरक्षण मिल सकता है। हालांकि यह सुविधा हर लिव-इन रिश्ते पर स्वतः लागू नहीं होगी।

हर लिव-इन संबंध को नहीं मिलेगा लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि सभी लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह के बराबर नहीं माना जाएगा। अदालत प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की अलग-अलग जांच करेगी। यदि यह पाया जाता है कि दोनों लंबे समय तक साथ रहे, सामाजिक रूप से पति-पत्नी की तरह जीवन बिताया और उनका संबंध विवाह जैसी प्रकृति का था, तभी संबंधित महिला को कानून के तहत संरक्षण मिलेगा। इसका उद्देश्य कानून का दुरुपयोग रोकना और वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाना है।

बदलते समाज के अनुरूप कानून

अदालत ने कहा कि वर्तमान समय में खासकर शहरी क्षेत्रों में लिव-इन रिलेशनशिप एक सामाजिक वास्तविकता बन चुके हैं। ऐसे रिश्तों में भी महिलाओं को मानसिक, शारीरिक या भावनात्मक प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है। यदि कानून केवल शादीशुदा महिलाओं तक सीमित रहेगा तो कई पीड़ित महिलाएं न्याय से वंचित रह जाएंगी। इसलिए कानून की व्याख्या करते समय उसके उद्देश्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने दोहराया कि न्याय व्यवस्था का लक्ष्य पीड़ित को सुरक्षा देना है, न कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर अधिकार तय करना।

महिलाओं के अधिकारों को मिलेगा बल

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे विवाह जैसी प्रकृति वाले लिव-इन रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को घरेलू हिंसा और क्रूरता के मामलों में कानूनी कार्रवाई करने का स्पष्ट आधार मिलेगा। साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि हर मामले का फैसला उसके तथ्यों के आधार पर किया जाएगा, जिससे वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी और कानून के दुरुपयोग पर भी नियंत्रण रहेगा। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल साबित हो सकता है।

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