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Minority Quota: धर्म परिवर्तन कर मेडिकल में दाखिले की कोशिश, अल्पसंख्यक कोटे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Supreme Court on Minority Quota:सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और संवेदनशील मामले में साफ शब्दों में कहा है कि अल्पसंख्यक कोटे का गलत इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने इसे “फ्रॉड का नया तरीका” बताते हुए कहा कि इस तरह की कोशिशें असली अल्पसंख्यकों के हक छीनने जैसी हैं। मामला उन दो उम्मीदवारों से जुड़ा है, जो अपर कास्ट से होने के बावजूद बौद्ध धर्म अपनाकर पीजी मेडिकल कोर्स में अल्पसंख्यक कोटे से दाखिला लेना चाहते थे। सुप्रीम कोर्ट हरियाणा के दो उम्मीदवारों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इन दोनों ने उत्तर प्रदेश के एक मेडिकल कॉलेज में बौद्ध अल्पसंख्यक कोटे से प्रवेश की मांग की थी। उम्मीदवारों का दावा था कि उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया है और इसके समर्थन में उन्होंने एसडीओ द्वारा जारी प्रमाणपत्र भी कोर्ट के सामने पेश किया।

जाति पूछते ही कोर्ट हुआ सख्त

सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों से उनकी जाति पूछी, तो जवाब मिला कि वे जाट समुदाय से हैं। यह सुनते ही कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और कहा कि जब आप अपर कास्ट से आते हैं, तो फिर अल्पसंख्यक कैसे हो गए?
कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ धर्म बदल लेने से कोई व्यक्ति अपने सामाजिक और कानूनी दर्जे को नहीं बदल सकता, खासकर तब जब इसका इस्तेमाल आरक्षण या कोटे का लाभ लेने के लिए किया जा रहा हो।

NEET-PG फॉर्म और दावे पर सवाल

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों उम्मीदवारों ने NEET-PG 2025 का फॉर्म सामान्य वर्ग के तहत भरा था। इसके बाद अब वे बौद्ध अल्पसंख्यक मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना चाहते हैं। इस विरोधाभास को लेकर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए और कहा कि यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर असर डालता है।

मुख्य सचिव से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे दो हफ्ते के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट जानना चाहता है कि अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने के लिए राज्य में स्पष्ट नियम क्या हैं।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या किसी अपर कास्ट उम्मीदवार को बौद्ध अल्पसंख्यक माना जा सकता है? अगर ऐसा संभव नहीं है, तो फिर एसडीओ ने इन दोनों उम्मीदवारों को प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किया?

असली अल्पसंख्यकों के हक की बात

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों से उन लोगों के अधिकार प्रभावित होते हैं, जो वास्तव में अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और जिनके लिए ये सुविधाएं बनाई गई हैं। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अगर समय रहते इस पर सख्ती नहीं की गई, तो यह गलत परंपरा बन सकती है।अब सभी की नजरें राज्य सरकार की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो सकेगा कि नियमों का पालन हुआ या नहीं।

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