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Home in Noida: कहां तक पहुंची छोटे 2BHK फ्लैट की कीमत, क्यों नोएडा में घर खरीदना हो गया मुश्किल?

Buying a Home in Noida नोएडा में अपना घर खरीदना अब मिडिल क्लास परिवारों के लिए पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों और महंगे होम लोन ने आम नौकरीपेशा लोगों के लिए घर का सपना मुश्किल बना दिया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दावा किया गया कि नोएडा में एक छोटे 2BHK फ्लैट को खरीदने के लिए भी कम से कम 1 लाख रुपये या उससे अधिक मासिक आय की जरूरत पड़ती है। इस दावे ने रियल एस्टेट की बढ़ती कीमतों और घर खरीदने की वास्तविक लागत पर नई चर्चा छेड़ दी है।

80 लाख रुपये तक पहुंची छोटे 2BHK फ्लैट की कीमत

इंस्टाग्राम पर कंटेंट क्रिएटर ऋषि शांडिल्य ने एक वीडियो साझा करते हुए बताया कि नोएडा में छोटे आकार के 2BHK फ्लैट, जिन्हें लोग मजाक में ‘माचिस की डिब्बी’ या ‘कबूतरखाना’ कहते हैं, उनकी कीमत भी लगभग 75 से 80 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। उनका कहना है कि घर खरीदने की इच्छा रखने वाले लोगों को केवल फ्लैट की कीमत ही नहीं, बल्कि डाउन पेमेंट, बैंक लोन और मासिक ईएमआई जैसी आर्थिक जिम्मेदारियों का भी सामना करना पड़ता है।

घर खरीदने का पूरा गणित समझिए

वीडियो में बताया गया कि यदि किसी फ्लैट की कीमत 80 लाख रुपये है, तो खरीदार को करीब 20 से 25 लाख रुपये का डाउन पेमेंट पहले से तैयार रखना होगा। इसके बाद लगभग 55 से 60 लाख रुपये का होम लोन लेना पड़ेगा। इतना बड़ा लोन मंजूर कराने के लिए बैंक आमतौर पर खरीदार की मासिक आय 1 लाख से 1.20 लाख रुपये के बीच देख सकते हैं। यदि 60 लाख रुपये का लोन मिलता है, तो हर महीने लगभग 60,000 से 65,000 रुपये तक की ईएमआई चुकानी पड़ सकती है। हालांकि वास्तविक लोन पात्रता, ब्याज दर और ईएमआई बैंक, अवधि तथा आवेदक की वित्तीय प्रोफाइल पर निर्भर करती है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने जताई चिंता

वीडियो के साथ साझा किए गए संदेश में कहा गया कि नौकरीपेशा लोगों के लिए आज के समय में अपना घर खरीदना लगातार कठिन होता जा रहा है। इस वीडियो पर बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतिक्रिया देते हुए बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों पर चिंता जाहिर की। कई लोगों ने लिखा कि मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना अब सपना बनता जा रहा है, जबकि कुछ ने कहा कि बढ़ती महंगाई और ऊंची ईएमआई के कारण किराये के मकान में रहना ही मजबूरी बन गया है। यह चर्चा इस बात की ओर भी इशारा करती है कि बड़े शहरों में आवास की लागत लगातार आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही है।

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