Kamakhya Temple:मां कामाख्या मंदिर को देश के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। ऐसे में मंदिर के आसपास प्रस्तावित कॉरिडोर को लेकर सिर्फ विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं और साधना से जुड़ा सवाल भी उठ रहा है। विरोध करने वाले साधकों का कहना है कि मंदिर का स्वरूप और उसकी आध्यात्मिक व्यवस्था किसी सामान्य पर्यटन स्थल की तरह नहीं देखी जा सकती। उनके मुताबिक अगर विकास के नाम पर मंदिर से जुड़ी मूल परंपराएं प्रभावित होती हैं, तो इसका सीधा असर श्रद्धालुओं और साधकों की आस्था पर पड़ेगा।
साधक पहुंचे Court
कॉरिडोर परियोजना को लेकर कुछ लोगों और संगठनों ने कानूनी रास्ता अपनाया। याचिकाओं में आशंका जताई गई कि निर्माण कार्य से मंदिर की पुरानी संरचना, धार्मिक गतिविधियों और आसपास के प्राकृतिक स्रोतों पर असर पड़ सकता है। इसी दौरान साधकों की ओर से भी अपनी चिंताएं सामने रखी गईं। उनका तर्क है कि मंदिर को केवल खूबसूरत और सुविधाजनक बनाना पर्याप्त नहीं है। अगर उसकी आध्यात्मिक पहचान और परंपराएं कमजोर हो जाएं, तो बाहरी विकास का महत्व ही क्या रह जाएगा।
झरनों पर भी चिंता
कॉरिडोर निर्माण से जुड़े मामले में जमीन के नीचे पानी के बहाव और पवित्र झरनों को लेकर भी सवाल उठे। असम सरकार ने कोर्ट को बताया कि इन चिंताओं को दूर करने के लिए IIT गुवाहाटी के साथ तकनीकी स्तर पर काम किया गया। झरनों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए परियोजना में कुछ बदलाव भी किए गए। सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया कि जरूरी पर्यावरणीय और संरचनात्मक सुरक्षा मानकों को पूरा किए बिना निर्माण आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
हाईकोर्ट ने दी अनुमति
करीब दो साल तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कॉरिडोर निर्माण का रास्ता साफ कर दिया। अदालत ने सरकार को निर्माण आगे बढ़ाने की अनुमति दी, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि काम के दौरान मंदिर की धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों में किसी तरह की बाधा नहीं आनी चाहिए। यानी परियोजना पर लगी कानूनी अड़चनें दूर हो गई हैं, लेकिन धार्मिक और पर्यावरणीय पहलुओं की जिम्मेदारी सरकार पर बनी रहेगी।
मंदिर विकास या संरक्षण?
कामाख्या कॉरिडोर का उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुविधाओं को बेहतर करना और मंदिर क्षेत्र का व्यवस्थित विकास करना बताया जा रहा है। लेकिन विरोध करने वाले साधकों के लिए असली सवाल यह है कि विकास की सीमा कहां तय होगी। उनका कहना है कि मंदिर की आत्मा उसकी परंपराओं, साधना और प्राकृतिक वातावरण से जुड़ी है। इसलिए कॉरिडोर बनाते समय सिर्फ इमारत और रास्ते नहीं, बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक व्यवस्था को भी सुरक्षित रखना होगा। इसी वजह से अब इस परियोजना पर निर्माण के साथ-साथ संरक्षण की बहस भी तेज हो गई है।
