Sawan Shivratri Jalabhishek Muhurat:सावन माह में आने वाली शिवरात्रि को सावन शिवरात्रि कहा जाता है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस वर्ष सावन शिवरात्रि 11 अगस्त, मंगलवार को मनाई जा रही है। यह दिन विशेष रूप से कांवड़ियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरा के अनुसार, कांवड़िये इस दिन अपने क्षेत्र के शिवालयों में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं।
भद्रा का साया
पंचांग के अनुसार, श्रावण कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 11 अगस्त को सुबह 4 बजकर 55 मिनट से प्रारंभ होकर मध्यरात्रि के बाद 1 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर सावन शिवरात्रि का व्रत एवं पूजन 11 अगस्त को ही किया जा रहा है। वहीं, इस दिन सूर्योदय से दोपहर 3 बजकर 25 मिनट तक भद्रा का प्रभाव रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में शुभ कार्यों से परहेज करने की सलाह दी जाती है।
जलाभिषेक का समय
भद्रा दोपहर 3 बजकर 25 मिनट तक रहने के कारण इसके पश्चात शिवलिंग पर जलाभिषेक करना शुभ माना गया है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, सावन शिवरात्रि पर प्रदोष काल और निशीथ काल में भगवान शिव का विशेष अभिषेक किया जाता है। श्रद्धालु अपनी सुविधा एवं स्थानीय मंदिर की पूजा व्यवस्था के अनुसार इन समयों में जलाभिषेक कर सकते हैं। भद्रा समाप्त होने के बाद पूजा को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह देखा जाता है।
शुभ मुहूर्त
11 अगस्त को भद्रा समाप्त होने के बाद कई शुभ मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं। शुभ चौघड़िया दोपहर 3:45 बजे से शाम 5:25 बजे तक रहेगा। इसके पश्चात प्रदोष काल शाम 6:04 बजे से रात 8:04 बजे तक रहेगा। वहीं लाभ चौघड़िया रात 8:25 बजे से 9:46 बजे तक रहेगा। श्रद्धालु इन शुभ समयों में भगवान शिव का जलाभिषेक एवं पूजन कर सकते हैं।
शिव पूजा की मान्यता
सावन माह को भगवान शिव का अत्यंत प्रिय महीना माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में श्रद्धापूर्वक भगवान शिव को जल और बेलपत्र अर्पित करने से भक्तों को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसी कारण सावन सोमवार और शिवरात्रि पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु दूध, जल, बेलपत्र एवं अन्य पूजन सामग्री से शिवलिंग का अभिषेक कर भगवान शिव से सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
भक्तों में उत्साह
सावन शिवरात्रि के अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में प्रातःकाल से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जाती है। कांवड़ यात्रा पूर्ण करने वाले शिवभक्त भी इस दिन शिवालयों में जल अर्पित कर अपनी यात्रा का समापन करते हैं। भद्रा के कारण इस वर्ष दोपहर के बाद जलाभिषेक का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, पूजा के समय में स्थानीय पंचांग एवं मंदिर व्यवस्था के अनुसार कुछ अंतर संभव है।
