बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने दुर्गा पूजा के दौरान बंगाल के लोगों से मांस-मछली से दूर रहने की अपील की, जिसके बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि बंगाल के लोग क्या खाएंगे, इसका फैसला कोई बाहर से आकर नहीं कर सकता। इस बयान ने खानपान और धार्मिक परंपरा की बहस के साथ बंगाल की मछली अर्थव्यवस्था को भी चर्चा में ला दिया है। यहां मछली केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति और रोजगार का अहम हिस्सा है।
लाखों लोगों का रोजगार
पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख मछली उत्पादक राज्यों में शामिल है। 2024-25 में राज्य में करीब 23.75 लाख टन मछली उत्पादन हुआ। इसमें से लगभग 1.78 लाख टन मछली दूसरे राज्यों में भेजी गई। यानी बंगाल अपनी जरूरत पूरी करने के साथ दूसरे राज्यों की मांग भी पूरी करता है। मछली पालन, बीज उत्पादन, मछली पकड़ने, मंडी कारोबार, थोक और खुदरा बिक्री, ट्रांसपोर्ट तथा प्रोसेसिंग से करीब 32 लाख लोगों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आजीविका जुड़ी होने का अनुमान है।
तालाब से बाजार
बंगाल में मछली का कारोबार तालाब या नदी से शुरू होकर सीधे ग्राहक तक पहुंचने से पहले कई चरणों से गुजरता है। किसान से मछली खरीदने वाले कारोबारी, मंडी, ग्रेडिंग, पैकिंग, बर्फ, कोल्ड चेन, ट्रांसपोर्ट और खुदरा विक्रेता तक पूरी सप्लाई चेन काम करती है। एक अध्ययन में पूर्व मेदिनीपुर और उत्तर 24 परगना में उत्पादन और मार्केटिंग लागत करीब 109.6 रुपये प्रति किलो आंकी गई थी। इसी अध्ययन में करीब 50.2 रुपये प्रति किलो औसत शुद्ध मुनाफे और 9.8 फीसदी पोस्ट हार्वेस्ट लॉस का अनुमान सामने आया।
झींगा से कमाई
बंगाल के मछली कारोबार में झींगा का एक्सपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य के बजट दस्तावेजों के अनुसार फिश एक्सपोर्ट में 70 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी ब्रैकिश वाटर प्रजातियों की है। 2024-25 में पश्चिम बंगाल से करीब 1,14,769 टन समुद्री उत्पादों का निर्यात हुआ, जिसकी कीमत लगभग 4,333 करोड़ रुपये रही। अमेरिका, जापान, चीन, यूरोप और मिडिल ईस्ट जैसे बाजारों में बंगाल के झींगा की मांग है। अमेरिका को खास तौर पर हाई-वैल्यू बाजार माना जाता है।
घरेलू बाजार बड़ा
बंगाल में मछली की घरेलू मांग भी कम नहीं है। रोहू, कतला, तिलापिया, पंगास, पाबदा, टेंगरा, हिल्सा और झींगा जैसी मछलियां अलग-अलग वर्ग के ग्राहकों के बीच लोकप्रिय हैं। हिल्सा जैसी प्रीमियम मछलियों का कारोबार सीजन के दौरान खासा बढ़ जाता है। अगर औसत कीमत 180 से 250 रुपये प्रति किलो मानें, तो 23.75 लाख टन उत्पादन का अनुमानित खुदरा मूल्य करीब 42,750 करोड़ से 59,375 करोड़ रुपये बैठता है। हालांकि, यह आधिकारिक मार्केट साइज नहीं, बल्कि उत्पादन और औसत कीमत के आधार पर निकाला गया अनुमान है।
सिर्फ खानपान नहीं
यही वजह है कि बंगाल में मछली को लेकर होने वाली बहस सिर्फ पसंद और नापसंद तक सीमित नहीं रहती। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ सांस्कृतिक पहचान, किसानों की कमाई, स्थानीय बाजार और निर्यात कारोबार भी जुड़ा है। इसलिए धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर प्रतिक्रिया सिर्फ खानपान को लेकर नहीं आई, बल्कि इसने बंगाल की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से जुड़े एक बड़े मुद्दे को भी सामने ला दिया है।
