Delhi Max Hospital: दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में चार मरीजों का फोर-वे किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट किया गया। इन मरीजों के परिवार के लोग गुर्दा दान करने के लिए तैयार थे, लेकिन मेडिकल कारणों से वे सीधे अपने रिश्तेदार को गुर्दा नहीं दे सकते थे।
डॉक्टरों ने ऐसी स्थिति में पेयर किडनी एक्सचेंज का रास्ता अपनाया। इसमें एक दाता का गुर्दा उसके अपने रिश्तेदार को देने के बजाय किसी दूसरे मरीज को दिया जाता है, जबकि दूसरे दाता का गुर्दा पहले मरीज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह चारों मरीजों को उनके लिए उपयुक्त गुर्दा मिल गया।
चार राज्यों के आठ लोग हुए शामिल
अस्पताल के मुताबिक, इस पूरे ट्रांसप्लांट में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, बिहार और नगालैंड के आठ लोग शामिल थे। इनमें चार मरीज और चार किडनी डोनर थे। सही मरीज और दाता की जोड़ी तय करने के लिए एलायंस फॉर पेयर्ड किडनी डोनेशन (एपीकेडी) सॉफ्टवेयर की मदद ली गई।
अस्पताल ने एक ही दिन में आठ सर्जरी कीं। सभी ऑपरेशन सफल रहे और बाद में मरीजों को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई।
क्यों नहीं हो पाया सीधा किडनी ट्रांसप्लांट?
नगालैंड की 34 वर्षीय मरीज के भाई की किडनी उनके लिए मैच नहीं कर रही थी। मरीज के शरीर में भाई की किडनी के खिलाफ एंटीबॉडी बन गई थीं।
वहीं, जम्मू-कश्मीर के 47 वर्षीय मरीज को उनकी 42 वर्षीय बहन की किडनी नहीं दी जा सकी, क्योंकि दोनों के बीच जरूरी इम्यूनोलॉजिकल मैच नहीं था।
दिल्ली की 46 वर्षीय महिला को उनके 49 वर्षीय पति की किडनी भी सीधे नहीं दी जा सकती थी। गर्भावस्था के बाद उनके शरीर में पति से जुड़े कुछ एंटीजन के खिलाफ एंटीबॉडी बन गई थीं।
बिहार के 34 वर्षीय मरीज के मामले में भी समस्या थी। वह अपनी 36 वर्षीय पत्नी से सीधे किडनी नहीं ले सकते थे, क्योंकि दोनों का ब्लड ग्रुप एक जैसा नहीं था।
पेयर एक्सचेंज से निकला समाधान
इन सभी मामलों में डॉक्टरों ने चारों दाताओं को दूसरे मरीजों के साथ मैच किया। इस तरह हर दाता की किडनी ऐसे मरीज को मिली, जिसके लिए वह मेडिकल रूप से ज्यादा उपयुक्त थी। इस प्रक्रिया ने उन चारों मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट का रास्ता खोल दिया।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया के लिए जरूरी अनुमति हासिल करना आसान नहीं था। कई दस्तावेज जमा करने पड़े और बार-बार प्रस्तुतियां देनी पड़ीं। मामले की गहन जांच के बाद जरूरी अनुमति के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का भी रुख करना पड़ा।
कई महीनों की मेडिकल तैयारी और कानूनी प्रक्रिया के बाद जुलाई में यह स्वैप ट्रांसप्लांट किया गया। अस्पताल के नेफ्रोलॉजी एवं रीनल ट्रांसप्लांट मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. दिनेश खुल्लर ने कहा कि पेयर किडनी एक्सचेंज उन मरीजों के लिए उम्मीद की नई राह बन सकता है, जिनके पास डोनर तो है, लेकिन ब्लड ग्रुप या किसी अन्य मेडिकल वजह से सीधा ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता।
