Dynastic Politics: कुछ दिन पहले तक यही माना जा रहा था कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने लंबे राजनीतिक जीवन में जिस सिद्धांत पर चलते आए हैं, उसे कायम रखेंगे। वे हमेशा से राजनीति में परिवारवाद के विरोधी माने जाते रहे हैं। लोग यह भी मानते थे कि वे अपने आदर्श कर्पूरी ठाकुर की तरह अपने परिवार को राजनीति से दूर ही रखेंगे।
कर्पूरी ठाकुर को नीतीश कुमार अपना आदर्श बताते रहे हैं। कर्पूरी ठाकुर ने अपने पूरे जीवन में अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया था। इसी वजह से यह उम्मीद की जा रही थी कि नीतीश कुमार भी उसी रास्ते पर चलेंगे। पिछले लगभग एक साल से यह चर्चा चल रही थी कि उनके बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाया जा सकता है। लेकिन इस विषय पर नीतीश कुमार ने कभी खुलकर कुछ नहीं कहा। निशांत कुमार भी इस सवाल को हमेशा टालते रहे। इसलिए लोगों को लगता था कि नीतीश कुमार परिवारवाद के खिलाफ अपने पुराने विचार से पीछे नहीं हटेंगे।
लेकिन अब हालात बदल गए हैं। नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में आने की अनुमति दे दी है। शनिवार को निशांत कुमार ने औपचारिक रूप से जेडीयू (जनता दल यूनाइटेड) की सदस्यता भी ले ली। इसके बाद राजनीतिक विरोधियों को नीतीश कुमार की आलोचना करने का मौका मिल गया। कई लोग कह रहे हैं कि बेटे के मोह में उन्होंने अपनी पुरानी छवि और सिद्धांत को खुद ही कमजोर कर दिया।
समाजवादी सोच और परिवारवाद का विरोध
नीतीश कुमार लंबे समय से समाजवादी विचारधारा से जुड़े नेता रहे हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि राजनीति में परिवारवाद लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होता। उनका मानना रहा है कि किसी नेता के परिवार से होने के कारण किसी को राजनीति में आगे नहीं बढ़ना चाहिए। इसी सोच के आधार पर वे अक्सर कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य पार्टियों पर परिवारवाद का आरोप लगाते रहे हैं। वे बार-बार कहते थे कि उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर अपने परिवार को राजनीति से दूर रखा है।
लेकिन अब जब उनके बेटे निशांत कुमार राजनीति में आ गए हैं, तो उनके पुराने बयान और मौजूदा फैसले के बीच अंतर दिखाई दे रहा है। इसी वजह से राजनीतिक हलकों में इस फैसले पर चर्चा और सवाल दोनों उठ रहे हैं।
राहुल गांधी के बयान पर भी जताया था विरोध
साल 2017 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि भारत की राजनीति में परिवारवाद एक सामान्य बात है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और एम.के. स्टालिन जैसे नेताओं का नाम लिया था।
राहुल गांधी के इस बयान का नीतीश कुमार ने कड़ा विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि परिवारवाद को भारत की राजनीति में सामान्य बताना गलत है। उनका कहना था कि किसी राजनीतिक परिवार में जन्म लेना किसी को शासन करने के लिए योग्य नहीं बना देता। नीतीश कुमार ने यह भी कहा था कि गैर-परिवारवादी नेता अक्सर बेहतर काम करते हैं। उनके अनुसार भारत में परिवारवाद की शुरुआत कांग्रेस से हुई और बाद में यह अन्य दलों में भी फैल गया।
लालू यादव के परिवारवाद पर भी करते रहे हमला
नीतीश कुमार अक्सर राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार को लेकर भी परिवारवाद का मुद्दा उठाते रहे हैं। उन्होंने कई बार कहा कि कुछ नेता अपने परिवार के लोगों को ही राजनीति में आगे बढ़ाते हैं। राजद में लालू यादव के दोनों बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती राजनीति में सक्रिय हैं। इस कारण नीतीश कुमार राजद को परिवार केंद्रित पार्टी बताते रहे हैं। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे पर विपक्ष पर निशाना साधा था। उनका कहना था कि वे पूरे बिहार को अपना परिवार मानते हैं, जबकि कुछ लोग केवल अपने खून के रिश्तों को ही परिवार समझते हैं।
अब बदली स्थिति और बढ़ी राजनीतिक चर्चा
पिछले एक साल से निशांत कुमार के राजनीति में आने की चर्चा चल रही थी। शुरुआत तब हुई जब उन्होंने अपने गांव के एक कार्यक्रम में लोगों से अपने पिता को दोबारा जीताने की अपील की थी। हालांकि उस समय भी उन्होंने राजनीति में आने के सवाल को हल्के में टाल दिया था। जेडीयू के कुछ नेताओं ने भी कहा था कि पार्टी के कई कार्यकर्ता चाहते हैं कि निशांत कुमार राजनीति में आएं।
अब जब नीतीश कुमार की सहमति के बाद निशांत कुमार ने जेडीयू की सदस्यता ले ली है, तो राजनीतिक माहौल में नई बहस शुरू हो गई है। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो नेता हमेशा परिवारवाद का विरोध करते थे, अब वही अपने बेटे को राजनीति में ला रहे हैं।





