Karnataka High court: बॉडी लोशन की मामूली बात से शुरू हुआ घरेलू झगड़ा, जानिए घर की बात, अदालत तक कैसे पहुंची

बॉडी लोशन लाने की छोटी बात से शुरू हुआ पति-पत्नी का विवाद कर्नाटक हाई कोर्ट पहुंचा। अदालत ने ऐसे मामलों में समझदारी, बातचीत और मध्यस्थता को प्राथमिकता देने की सलाह दी।

Small Dispute Reaches High Court: यह मामला एक आम घरेलू बहस से शुरू हुआ, लेकिन देखते ही देखते कर्नाटक हाई कोर्ट तक जा पहुंचा। पति-पत्नी के बीच होने वाले छोटे-मोटे झगड़े आम बात हैं, लेकिन जब ऐसे मामले अदालत में पहुंचते हैं, तो यह न्याय व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए Karnataka High Court ने इस मामले की सुनवाई के दौरान वैवाहिक जीवन, समझदारी और न्यायिक संसाधनों के सही इस्तेमाल पर अहम टिप्पणी की।

क्या है पूरा मामला

कई साल से शादीशुदा इस जोड़े के बीच विवाद तब शुरू हुआ, जब पति बाजार से अपनी पत्नी के कहे अनुसार स्किनकेयर का सामान, यानी बॉडी लोशन, लाना भूल गया। पत्नी का कहना था कि यह सिर्फ एक लोशन की बात नहीं है, बल्कि उसके पति बार-बार उसकी जरूरतों और बातों को नजरअंदाज करते हैं। महिला ने आरोप लगाया कि पति अपने खर्चों को तो अहमियत देता है, लेकिन उसकी बुनियादी जरूरतों को हल्के में लेता है। उसके अनुसार, यह रवैया मानसिक परेशानी और भावनात्मक तनाव पैदा करता है, जिसे वह मानसिक उत्पीड़न मानती है।

पति ने क्या कहा

पति ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह जानबूझकर बॉडी लोशन नहीं भूला था। काम का ज्यादा दबाव और थकान होने के कारण उससे यह गलती हो गई। उसने साफ कहा कि एक कॉस्मेटिक सामान को लेकर केस दर्ज कराना कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है। पति के मुताबिक, पति-पत्नी के निजी मामलों को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए, न कि सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए।

हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

मामले की शुरुआती सुनवाई में हाई कोर्ट ने इस याचिका पर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि कानून गंभीर मामलों, जैसे शारीरिक या मानसिक क्रूरता, से बचाने के लिए बना है। रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों को लेकर कोर्ट आना सही नहीं है। न्यायाधीशों ने कहा कि शादीशुदा जीवन में मतभेद होना स्वाभाविक है। अगर हर छोटी बात अदालत में लाई जाएगी, तो इससे उन मामलों पर असर पड़ेगा, जिन्हें सच में तुरंत न्याय की जरूरत है। अदालत ने यह भी साफ किया कि बॉडी लोशन न लाना तब तक क्रूरता नहीं कहा जा सकता, जब तक वह किसी बड़े शोषण या अत्याचार का हिस्सा न हो।

मध्यस्थता का रास्ता चुना गया

हाई कोर्ट ने इस मामले को बेंगलुरु स्थित मध्यस्थता केंद्र भेज दिया है। अदालत का मानना है कि कानूनी लड़ाई के बजाय बातचीत और काउंसलिंग से बेहतर समाधान निकल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यस्थता के दौरान दोनों पक्षों को एक-दूसरे की बातें समझने और आपसी तालमेल सुधारने का मौका मिलेगा। इसमें पैसों के प्रबंधन, जिम्मेदारियों और संवाद की कमी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी, ताकि जल्द से विवाद सुलझ सके।

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