बिहार के कटिहार से शिक्षा विभाग से जुड़ा हैरान करने वाला मामला सामने आया है। प्राणपुर प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय दीघापार को लेकर ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि सरकारी रिकॉर्ड में स्कूल की इमारत बन चुकी है, लेकिन जमीन पर उसका कोई अता-पता नहीं है।
इसी शिकायत को लेकर ग्रामीण ढोल-नगाड़े बजाते हुए जिला प्रशासन के पास पहुंचे। उन्होंने अधिकारियों से अनोखे अंदाज में कहा कि ‘विद्यालय चोरी हो गया है साहब’। ग्रामीणों ने स्कूल को ढूंढने और पूरे मामले की जांच कराने की मांग की।
44.85 लाख रुपये हुए जारी
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, प्राथमिक विद्यालय दीघापार के भवन निर्माण के लिए निविदा प्रक्रिया पूरी की गई थी। बिहार ई-प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड में इस काम की निविदा संख्या 2024_BSEB_314680-1 दर्ज है।
रिकॉर्ड के अनुसार स्कूल भवन के निर्माण के लिए कुल 44 लाख 85 हजार रुपये की राशि जारी की गई। निर्माण से जुड़ी प्रक्रिया साल 2024 में शुरू होने की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।
तीन किस्तों में पूरा भुगतान
रिकॉर्ड के मुताबिक निर्माण कार्य के लिए संबंधित कार्य एजेंसी को तीन किस्तों में पूरी रकम का भुगतान किया गया।
पहली किस्त के तौर पर 18 अप्रैल 2024 को 15 लाख रुपये दिए गए। इसके बाद 28 सितंबर 2024 को दूसरी किस्त में 15 लाख रुपये का भुगतान हुआ। तीसरी और अंतिम किस्त में 12 मार्च 2025 को 14 लाख 85 हजार रुपये जारी किए गए।
इस तरह स्कूल भवन के निर्माण के लिए स्वीकृत पूरी 44 लाख 85 हजार रुपये की राशि का भुगतान हो गया।
प्रमाण पत्र ने उठाए सवाल
मामले में सबसे बड़ा सवाल स्कूल भवन के पूर्णता प्रमाण पत्र को लेकर उठ रहा है। बिहार ई-प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड के अनुसार 25 मार्च 2025 को निर्माण कार्य पूरा होने का प्रमाण पत्र भी जारी किया गया।
यानी सरकारी रिकॉर्ड में भवन का निर्माण पूरा हो चुका है और पूरी राशि का भुगतान भी किया जा चुका है। दूसरी ओर ग्रामीणों का दावा है कि मौके पर स्कूल की इमारत बनी ही नहीं है।
ऐसे में ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि अगर भवन जमीन पर मौजूद नहीं है तो निर्माण पूरा होने का प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किया गया और भुगतान कैसे कर दिया गया?
स्कूल की जगह पानी
ग्रामीणों के मुताबिक, जिस जगह प्राथमिक विद्यालय दीघापार का भवन बनाया जाना था, वहां आज भी पानी भरा हुआ है। उनका दावा है कि मौके पर भवन निर्माण के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी है।
ग्रामीण अब जिला प्रशासन से पूरे मामले की जांच कराने और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड और जमीन पर मौजूद स्थिति के बीच इतना बड़ा अंतर आखिर कैसे पैदा हुआ, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
