Merger or Defection in Rajya Sabha: आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने आज बड़ा दावा करते हुए कहा कि वे और पार्टी के 6 अन्य सांसद भाजपा में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने इसे “विलय” बताया। लेकिन शाम तक तस्वीर बदलती नजर आई, क्योंकि भाजपा कार्यालय में उनके साथ केवल 3 सांसद ही दिखाई दिए।
सिर्फ तीन सांसद ही आए सामने
दिनभर चली चर्चाओं के बाद जो जानकारी सामने आई, उसके अनुसार राघव चड्ढा के साथ सिर्फ अशोक मित्तल और संदीप पाठक ही भाजपा में शामिल होते नजर आए। बाकी 4 सांसद हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
2/3 संख्या पर टिका मामला
राजनीतिक नियमों के मुताबिक, किसी पार्टी के विलय के लिए कम से कम 2/3 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, यानी विलय के लिए कम से कम 7 सांसदों का साथ होना जरूरी है। अगर यह संख्या पूरी नहीं होती, तो इसे विलय नहीं बल्कि दल-बदल माना जाएगा।
राघव चड्ढा का दावा क्या है?
राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनके पास जरूरी संख्या है और सभी सांसदों ने दस्तखत कर दिए हैं। उन्होंने बताया कि संबंधित दस्तावेज राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए गए हैं। हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि अगर सभी उनके साथ हैं, तो बाकी सांसद सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आए।
AAP की ओर से पलटवार
इस पूरे घटनाक्रम पर आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि वे राज्यसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक को अयोग्य घोषित करने की मांग करेंगे। उनके बयान से यह संकेत मिल रहा है कि AAP इस मामले को गंभीरता से ले रही है।
संसद में AAP की स्थिति
अगर यह मामला AAP के खिलाफ जाता है, तो राज्यसभा में पार्टी की ताकत काफी घट सकती है। अभी AAP के पास 10 सांसद हैं, लेकिन इस विवाद के बाद यह संख्या कम होकर सिर्फ 3 तक रह सकती है। इससे संसद में पार्टी की पकड़ कमजोर हो जाएगी।
क्या कहता है दल-बदल कानून?
भारत में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में 10वीं अनुसूची बनाई गई है। इसके तहत अगर कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है। लेकिन अगर 2/3 सांसद एक साथ पार्टी बदलते हैं, तो इसे “विलय” माना जाता है और उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है।
