Allahabad High Court Anticipatory Bail: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायशास्त्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी को ‘घोषित अपराधी’ (Proclaimed Offender) करार दिए जाने मात्र से उसकी अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार करने का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हो जाता। न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की पीठ ने एक नर्स, मोनिका की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 82 के तहत उद्घोषणा जारी होना अग्रिम जमानत की मांग पर पूर्ण प्रतिबंध (Total Embargo) नहीं लगाता है। यह आदेश उन परिस्थितियों में न्याय की उम्मीद जगाता है जहाँ आरोपी वाजिब कारणों से अदालत में पेश नहीं हो पाया हो, जिससे कानून की कठोरता और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक सकारात्मक संतुलन स्थापित होता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार
Allahabad HC ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2024 में ‘आशा दुबे बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ मामले में दी गई व्यवस्था का हवाला दिया। शीर्ष अदालत ने माना था कि अग्रिम जमानत के मामलों में प्रत्येक मामले की परिस्थितियों का बारीकी से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आरोपी किसी विशेष विवशता के कारण न्यायालय की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सका, तो उसे केवल तकनीकी आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
केस की पृष्ठभूमि और मानवीय पहलू
यह मामला बिजनौर के कीरतपुर थाने से संबंधित है, जहाँ याची मोनिका पर आईपीसी की धारा 316, 420 और मेडिकल काउंसिल एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज था। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि चूंकि याची के खिलाफ धारा 82 और 83 के तहत कार्यवाही शुरू हो चुकी है, इसलिए वह राहत की पात्र नहीं है।
हालांकि, Allahabad HC ने पाया कि जब याची के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया, उस समय वह गर्भवती थी। उसने 6 अक्टूबर 2025 को एक बच्चे को जन्म दिया था, जिसके कारण वह अदालत में पेश होने में असमर्थ थी। याची के वकील ने दलील दी कि उसने बार-बार व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए आवेदन दिए थे, जिन्हें निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया।
अदालत का सकारात्मक दृष्टिकोण
Allahabad HC न्यायमूर्ति चौधरी ने माना कि यह मामला अग्रिम जमानत के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। कोर्ट ने कहा:
“ऐसा नहीं है कि सभी मामलों में अग्रिम जमानत पर विचार करने पर रोक होगी। इस मामले में जब प्रक्रियाएं जारी की गईं, तो याची अपनी शारीरिक स्थिति (गर्भावस्था) के कारण पेश नहीं हो पाई थी।”
अदालत ने आरोपी को मुकदमे के समापन तक अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है। यह फैसला न केवल एक महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि न्याय प्रणाली मानवीय संकटों के प्रति संवेदनशील है।






