Site icon News1India

High Court Order: रिटायर हेड कॉन्स्टेबल को बड़ी राहत, 11.51 लाख की कटौती ब्याज समेत लौटाने का आदेश

High Court Decision: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त हेड कॉन्स्टेबल (चालक) बृजेश सिंह डागर के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को अहम निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि उनके सेवानिवृत्ति लाभों से गलत तरीके से काटी गई 11,51,840 रुपये की रकम वापस की जाए। इस राशि पर 7 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा। अदालत ने सरकार को भुगतान की प्रक्रिया छह सप्ताह के भीतर पूरी करने का आदेश दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने बृजेश सिंह डागर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया।

PAC से सिविल पुलिस तक सफर

बृजेश सिंह डागर की नियुक्ति 20 फरवरी 1984 को प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी यानी PAC में कांस्टेबल के पद पर हुई थी। बाद में उनका तबादला सिविल पुलिस में कर दिया गया। सेवा के दौरान वह हेड कॉन्स्टेबल (चालक) के पद तक पहुंचे और 31 जुलाई 2025 को सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति से कुछ समय पहले 24 अक्टूबर 2024 को संबंधित अधिकारी की ओर से उन्हें वेतनमान में संशोधन को लेकर स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस भेजा गया था।

वेतन में हुई बड़ी कटौती

डागर ने 26 अक्टूबर 2024 को अपना जवाब दाखिल करते हुए कहा था कि उन्होंने वेतन बढ़ाने के लिए कभी कोई आवेदन नहीं किया था। उन्होंने यह भी बताया कि वह जल्द ही रिटायर होने वाले हैं और उनके ऊपर कई वित्तीय जिम्मेदारियां हैं। इसके बावजूद उनका स्पष्टीकरण स्वीकार नहीं किया गया। 15 फरवरी 2025 को जारी आदेश के जरिए उनका वेतन 64,100 रुपये से घटाकर 56,900 रुपये कर दिया गया। खास बात यह थी कि इस बदलाव को 1 जुलाई 2023 से प्रभावी माना गया।

पिछली तारीख से वसूली पर सवाल

वेतन में किए गए इस पुनर्निर्धारण के बाद पहले से मिले अतिरिक्त भुगतान की रकम को उनके सेवानिवृत्ति लाभों से काट लिया गया। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने ही पुराने फैसले का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिटायरमेंट के समय कर्मचारी से लिया गया सामान्य घोषणापत्र ऐसा आधार नहीं बन सकता, जिसके जरिए पिछली तारीख से वेतन दोबारा तय करके अतिरिक्त रकम की वसूली की जाए। इसी आधार पर अदालत ने काटी गई राशि वापस करने का निर्देश दिया।

6.70 लाख का जुर्माना

इसी दौरान हाईकोर्ट ने आरटीआई कानून के कथित दुरुपयोग से जुड़े एक अलग मामले में भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने संबंधित याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 6.70 लाख रुपये का हर्जाना लगाया। कोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। इसका इस्तेमाल बेवजह मुकदमेबाजी करने या न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। दोनों मामलों में हाईकोर्ट की टिप्पणियां सरकारी प्रक्रिया और कानूनी अधिकारों के जिम्मेदार इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

Exit mobile version