Rajbhawan Cow Deaths: लखनऊ स्थित राजभवन की गोशाला में हुई तीन गोवंशों की दर्दनाक मौत और दो अन्य के गंभीर रूप से बीमार होने के मामले ने अब एक नया प्रशासनिक और राजनीतिक मोड़ ले लिया है। इस घटना की शुरुआती जांच के बाद पशु चिकित्सक डॉ. उमाकांत जायसवाल और पशुधन प्रसार अधिकारी सौरभ गुप्ता को निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, इस कार्रवाई ने अब विभाग के भीतर ही विरोध के स्वर मुखर कर दिए हैं। पशुधन प्रसार अधिकारी संघ ने इस निलंबन को अनुचित बताते हुए अब उन दवाओं की जांच की मांग की है, जो बीमार गायों के इलाज के दौरान इस्तेमाल की गई थीं। संघ का आरोप है कि दवाओं की खरीद और उनकी गुणवत्ता में गड़बड़ी हो सकती है, जिसका खामियाजा निचले स्तर के कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है।
निलंबन पर उठा विवाद
Rajbhawan पशुधन प्रसार अधिकारी संघ ने प्रमुख सचिव को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट किया है कि विभागीय नियमों के अनुसार, कोई भी प्रसार अधिकारी स्वतंत्र रूप से इलाज या दवा देने के लिए अधिकृत नहीं होता है। वे हमेशा पशु चिकित्सक (डॉक्टर) की देखरेख और उनके निर्देशों पर ही कार्य करते हैं। संघ के अध्यक्ष रवींद्र सिंह और महामंत्री फूलचंद्र सुमन का तर्क है कि जब निर्णय लेने का अधिकार डॉक्टर के पास था, तो प्रसार अधिकारी को जिम्मेदार ठहराकर निलंबित करना तर्कसंगत नहीं है।
दवाओं की खरीद और आपूर्ति के घेरे में विभाग
मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब संघ ने दवाओं की स्रोत पर सवाल उठाए। ज्ञापन में मांग की गई है कि इस बात की गहनता से जांच की जाए कि इलाज में उपयोग की गई दवाएं विभाग द्वारा सरकारी स्तर पर सप्लाई की गई थीं या उन्हें बाहर से निजी तौर पर खरीदा गया था। यह अंदेशा जताया जा रहा है कि घटिया दवाओं के कारण गोवंश की स्थिति और बिगड़ी होगी।
सरकार और प्रशासन का रुख
इस बढ़ते Rajbhawan विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने आश्वासन दिया है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार किसी भी निर्दोष कर्मचारी पर कार्रवाई नहीं होने देगी, लेकिन लापरवाही बरतने वालों को बख्शा भी नहीं जाएगा।
इससे पहले, Rajbhawan शासन की तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में डॉक्टर और प्रसार अधिकारी को प्रथम दृष्टया दोषी माना था। प्रमुख सचिव डॉ. बोबडे द्वारा जारी शासकीय पत्र में उल्लेख किया गया था कि गोशाला के पशुओं की देखभाल में गंभीर शिथिलता बरती गई है, जो राजकीय कर्तव्यों के प्रति बड़ी लापरवाही है। फिलहाल, दवाओं की जांच की मांग ने इस पूरे मामले को तकनीकी और प्रशासनिक पेचीदगियों में उलझा दिया है।


