यूजीसी कानून पर संग्राम: यूपी से बिहार तक सवर्ण समाज का आक्रोश, दिल्ली कूच की तैयारी

UGC के नए 'इक्विटी रेगुलेशन 2026' के खिलाफ यूपी, बिहार और राजस्थान में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सवर्ण समाज और करणी सेना ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए दिल्ली कूच की चेतावनी दी है। विवाद मुख्य रूप से ओबीसी को भेदभाव की श्रेणी में शामिल करने पर है।

UGC Equity

UGC Equity Regulations 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ को लेकर देश के कई राज्यों में विरोध की आग भड़क उठी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में सवर्ण समाज के छात्र और संगठन इस कानून को “भेदभावपूर्ण” बताते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। मेरठ से लेकर हापुड़ तक विरोध प्रदर्शन जारी हैं, जहां “सवर्ण अगेंस्ट बीजेपी” के पोस्टर लगाए गए हैं। वहीं, करणी सेना ने इसे समाज को बांटने वाला कदम बताते हुए दिल्ली में जंतर-मंतर पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। इस कानून के तहत ओबीसी (OBC) को जातिगत भेदभाव की सूची में शामिल करने और कॉलेजों में अनिवार्य ‘समान अवसर प्रकोष्ठ’ बनाने का प्रावधान है, जिसका सामान्य वर्ग कड़ा विरोध कर रहा है।

देशभर में विरोध की लहर: इस्तीफे और नजरबंदी

इस कानून का असर अब राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में दिखने लगा है।

क्या है विवाद की असली वजह?

UGC ने हाल ही में उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026 लागू किए हैं। इसके मुख्य बिंदु और विरोध के कारण निम्नलिखित हैं:

प्रावधान विरोध का तर्क
OBC का समावेश: पहली बार ओबीसी को भी जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत करने का अधिकार मिला है। सामान्य वर्ग का मानना है कि आरक्षण के बाद यह एक और विशेषाधिकार है जिसका दुरुपयोग हो सकता है।
इक्विटी कमेटी: हर कॉलेज में एससी, एसटी और ओबीसी प्रतिनिधियों वाली एक कमेटी बनाना अनिवार्य है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इसमें सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी है।
सख्त कार्रवाई: शिकायत मिलने के 24 घंटे में कार्रवाई और संस्थान की मान्यता रद्द करने तक का प्रावधान। छात्रों को डर है कि बिना जांच या झूठी शिकायतों के आधार पर उनका करियर बर्बाद हो सकता है।

करणी सेना और संगठनों का रुख

राजस्थान में करणी सेना ने इसे “काला कानून” करार दिया है। संगठन का दावा है कि यह बिल सवर्ण जातियों की अगली पीढ़ी को शैक्षणिक संस्थानों में प्रताड़ित करने का एक हथियार बन जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने इसे वापस नहीं लिया, तो देशव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 और 2027 के आगामी चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा अब केवल शैक्षिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप ले चुका है। जहां सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं सवर्ण संगठनों ने इसे “वोट बैंक की राजनीति” करार दिया है।

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