लखनऊ ऑनलाइन डेस्क। यूपी की जनता को अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ मॉडल पसंद आया और लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को प्रचंड जीत दिलाई। हार के बाद बीजेपी के अंदर मंथन चला। सीएम योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के नेताओं को दिल्ली में तलब किया। आखिर में पार्टी हाईकमान ने सीएम योगी आदित्यनाथ को क्लीन चिट दी। जिसके बाद सीएम उपचुनाव की तैयारियों में जुट गए। ताबड़तोड़ रैलियां की। रोड शो कर जन-जन तक पार्टी की बात पहुंचाई। ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ के नारे का शंखनाद किया, जो ‘पीडीए’ पर भारी पड़ गया। सीएम योगी की सटीक ‘गुगली’ को अखिलेश यादव नहीं भांप पाए और उपचुनाव में सिर्फ दो सीट ही जीत सके। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं सपा प्रमुख दिल्ली को छोड़कर लखनऊ आ सकते हैं।
उपचुनाव में चला सीएम योगी का जादू
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिल कर एसपी नेता अखिलेश यादव ने जो केमिस्ट्री तैयार की थी, उसका असर विधान सभा उपचुनाव में खत्म हो गया। उत्तर प्रदेश में नौ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में बीजेपी ने प्रचंड जीत दर्ज की। यूपी की कानपुर की सीसामऊ और करहल सीट पर सपा ने जीत दर्ज की है। बीजेपी ने गाजियाबाद, खैर, फूलपुर, मीरापुर, कुंदरकी, कटेहरी और मझवां सीट पर जीत दर्ज की है। इस जीत में सीएम योगी आदित्यनाथ ने अहम रोल निभाया। उन्हीं के नेतृत्व में बीजेपी ने चुनाव लड़ा। टिकट में भी सीएम योगी का दखल रहा। जिसका नतीजा रहा कि भारतीय जनता पार्टी ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहल प्रचंड जीत दर्ज कर सपा के अंदर हलचल बढ़ा दी है।
सीएम योगी ने तैयार की सटीक रणनीति
इस उपचुनाव में बीजेपी की सफलता का सेहरा अकेले सीएम योगी आदित्यनाथ के माथे ही बंधेगा। क्योंकि पार्टी की कई बैठकों में योगी ने लोकसभा चुनाव के बाद साफ कर दिया था कि उस वक्त उनके हिसाब से टिकट नहीं बांटे गए थे। कई सीटों पर केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी मर्जी से टिकट दे दिए थे। विधान सभा उप चुनावों में पार्टी ने कोई खतरा न उठाते हुए योगी को फ्री हैंड दिया। सीएम योगी ने तीन-तीन मंत्रियों को उत्तर प्रदेश की हर सीट की जिम्मेदारी दी। मीरापुर सीट पर पार्टी ने आरएलडी की महिला प्रत्याशी मिथलेश पाल को समर्थन दिया। इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अनुपातिक आकार में ठीक ठाक है। बाकी यहां दलित और पिछड़े मतदाता भी बहुतायत में हैं। बावजूद यहां एनडीए की जीत हुई।
लोकसभा में सपा-कांग्रेस को मिली थी जीत
दरअसल, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने लोकसभा में जो ‘बीजेपी आरक्षण खत्म कर देगी’ का नैरेटिव खड़ा किया उसे सफल माना गया था। अखिलेश यादव ने भी ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का नारा दिया था। समाजवादी पार्टी ने जब भी उत्तर प्रदेश में सफलता हासिल की है तो उसका आधार इन्ही समुदायों के मतदाताओं ने पुख्ता किया था। लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के साथ बीजेपी का खास वोटबैंक चला गया। जिसके कारण बीजेपी 37 सीटें ही जीत सकी। उपचुनाव में कांग्रेस ने सपा का समर्थन किया। अखिलेश यादव पीडीए फार्मूले के साथ चुनाव में उतरे।
सिर चढ़कर बोला ‘बंटेंगे तो कटेंगा’ का नारा
सीएम योगी आदित्यनाथ ने आगरा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा दिया। जो उपचुनाव में मील का पत्थर साबित हुआ। दो मायने वाला ये नारा एक तरफ मुस्लिम मतदाताओं के विरोध में था तो दूसरी ओर हिंदू मतदाताओं को एकजुट रहने का संदेश भी दे रहा था। योगी की रणनीति भी यही रही। एसपी कांग्रेस पार्टी ने 400 सीटें जीत कर आरक्षण व्यवस्था खत्म करने के जिस नैरेटिव खड़ा कर दलित -पिछड़े वोटरों को बीजेपी से दूर कर दिया था, उसे जोड़ने के लिए बीजेपी को कुछ ऐसा नारा ही चाहिए था। सीएम योगी के नारे को पार्टी ने दूसरे राज्यों में भी अपनाया।
तो सपा प्रमुख खा गए गच्चा
अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव के बाद करहल विधानसभा सीट छोड़ दी थी और कन्नौज लोकसभा सांसद रहते हुए दिल्ली शिफ्ट हो गए। लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सपा ने केंद्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाने के संकेत दिए थे। बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने पर अखिलेश यादव की नजर दिल्ली की कुर्सी पर थी। सपा-कांग्रेस को अनुमान था कि नायडू-नीतीश कुमार समर्थन वापस ले सकते हैं और सरकार बनाने का उन्हें मौका मिल सकता है। अखिलेश केंद्र की खिचड़ी सरकार में मुलायम की तरह बड़ी भूमिका निभाने की सोच रहे थे, लेकिन यह जल्दबाजी में लिया निर्णय साबित हुआ। सूत्र बताते हैं कि 2027 के चुनाव को देखते हुए सपा प्रमुख दिल्ली को छोड़कर लखनऊ आ सकते हैं। अखिलेश यादव संसद पद से रिजाइन भी कर सकते हैं।