UP SIR Draft voter List: उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सियासी माहौल अचानक गर्म हो गया है। आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के पहले चरण की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी कर दी है। जैसे ही यह सूची सामने आई, पूरे प्रदेश में चर्चा शुरू हो गई। वजह साफ है। इस बार बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, यूपी में कुल 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से कट गए हैं। पहले राज्य में मतदाताओं की संख्या करीब 15.44 करोड़ थी, जो अब घटकर 12.55 करोड़ रह गई है। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक असर को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
बड़े शहरों और जिलों में सबसे ज्यादा नाम कटे
ड्राफ्ट लिस्ट में सामने आया कि सबसे ज्यादा असर राजधानी लखनऊ में दिखा है। यहां करीब 30.05 फीसदी मतदाताओं के नाम कटे हैं। इसके अलावा गाजियाबाद में 28.83 फीसदी, बलरामपुर में 25.98 फीसदी, कानपुर नगर में 25.50 फीसदी और मेरठ में 24.66 फीसदी वोटरों की संख्या कम हुई है।
इतना ही नहीं, कई अन्य जिलों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। इनमें संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली और सहारनपुर जैसे जिले शामिल हैं, जो मुस्लिम बहुल माने जाते हैं। यही वजह है कि इन आंकड़ों ने राजनीतिक दलों और विश्लेषकों का ध्यान खींचा है।
मुस्लिम बहुल जिलों में गिरावट ने खींचा ध्यान
मुस्लिम बहुल जिलों में वोटरों की संख्या में आई गिरावट को लेकर खास चर्चा हो रही है। संभल में करीब 20 फीसदी, रामपुर में 18.29 फीसदी, मुरादाबाद में 15.76 फीसदी, सहारनपुर में 16.37 फीसदी, मुजफ्फरनगर में 16.29 फीसदी और बरेली में 20.99 फीसदी मतदाताओं के नाम कम हुए हैं। शाहजहांपुर में भी 21.76 फीसदी वोटरों की संख्या घट गई है।
चुनाव आयोग के अनुसार, हटाए गए नामों में 2.17 करोड़ शिफ्टेड मतदाता हैं, 46.23 लाख मृतक और 25.47 लाख डुप्लीकेट नाम शामिल हैं। ड्राफ्ट सूची आने के बाद जिन लोगों के नाम कटे हैं, वे अब फॉर्म-6 भरकर दोबारा नाम जुड़वाने की कोशिश में जुट गए हैं।
क्या वाकई बदल सकती है यूपी की सियासी दिशा?
इस सवाल का सीधा जवाब अभी देना मुश्किल है। जानकारों का मानना है कि मतदाताओं की संख्या में यह कमी औसतन हर सीट पर 4 से 5 फीसदी वोटों को प्रभावित कर सकती है। इसका असर विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में दिख सकता है।
हालांकि, अभी 6 फरवरी तक नाम जोड़ने और गलतियों में सुधार का मौका दिया गया है। इसके बाद अंतिम मतदाता सूची जारी होगी। तभी साफ हो पाएगा कि यूपी की सियासी हवा सच में बदलेगी या यह बदलाव केवल आंकड़ों तक ही सीमित रहेगा।










