SIR Voter List Revision:उत्तर प्रदेश में हाल ही में पूरी हुई SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया ने राज्य की राजनीति और समाज, दोनों को गहराई से झकझोर दिया है। इस प्रक्रिया के दौरान प्रदेश की वोटर लिस्ट से करीब पौने तीन करोड़ नाम हटा दिए गए। यह आंकड़ा सिर्फ चुनावी सूची तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यूपी के बीते 30 सालों की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति की कहानी भी बयान करता है। कई राजनीतिक जानकार इसे पिछले तीन दशकों की सबसे बड़ी “वोटर लिस्ट सफाई” बता रहे हैं।
सरकारी पक्ष का कहना है कि हटाए गए नामों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जिनके नाम दो-दो जगह दर्ज थे। कई वोटर ऐसे भी थे, जिनकी वर्षों पहले मौत हो चुकी थी, लेकिन उनके नाम सूची में बने हुए थे। इसके अलावा, लंबे समय से प्रदेश से बाहर रह रहे लोगों और फर्जीवाड़े की आशंका वाले नाम भी हटाए गए। बावजूद इसके, सवाल यह उठता है कि 25 करोड़ आबादी वाले राज्य में अगर 10 से 12 प्रतिशत वोटर सूची से बाहर हो जाएं, तो इसे सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया मानकर कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है।
पलायन बना सबसे बड़ा कारण
अगर गहराई से देखा जाए, तो इस पूरी प्रक्रिया के पीछे सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश से दशकों से हो रहा पलायन है। 1990 और 2000 के दशक में हालात इतने खराब थे कि लाखों लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर चले गए। पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली और बंगाल जैसे राज्यों में यूपी के लोगों की बड़ी आबादी आज भी बसी हुई है। अनुमान है कि बीते 25–30 वर्षों में एक करोड़ से ज्यादा लोग यूपी छोड़ चुके हैं। ऐसे में, जो लोग वर्षों से बाहर रह रहे हैं, उनके नाम वोटर लिस्ट से कटना स्वाभाविक है।
क्या मजबूरी बनी यूपी छोड़ने की?
आज भी प्रदेश के कई गांवों और कस्बों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। कहीं 24 घंटे बिजली नहीं है, तो कहीं ढंग का इंटरनेट नहीं मिलता। साल 2025 में भी अगर किसी को इंटरनेट के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ें, तो युवा वहां क्यों रुकेंगे? यही वजह रही कि पढ़े-लिखे और हुनरमंद लोग दूसरे राज्यों में बसते चले गए।
मृत और फर्जी वोटरों की सच्चाई
SIR के दौरान यह भी सामने आया कि कई ऐसे नाम वोटर लिस्ट में थे, जिनके मालिक 15–20 साल पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। साथ ही, पलायन कर चुके वोटरों के नाम पर फर्जी मतदान की आशंका भी लंबे समय से जताई जाती रही है। कुछ राजनीतिक दलों को ऐसे वोटरों से फायदा मिलता रहा, जिनकी असल में कोई मौजूदगी नहीं थी। इस नजरिए से देखा जाए, तो SIR ने फर्जीवाड़े पर भी बड़ी चोट की है।
राजनीतिक दलों की तैयारी पर सवाल
इस प्रक्रिया ने राजनीतिक दलों की जमीनी तैयारी पर भी सवाल खड़े कर दिए। अगर बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय होते और BLO के साथ तालमेल बनाते, तो कई नाम बचाए जा सकते थे। जानकारी के अभाव में बहुत से लोग फॉर्म ही नहीं भर पाए। तुलना के तौर पर पश्चिम बंगाल का उदाहरण दिया जा रहा है, जहां दलों ने BLO के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा।
वापसी की उम्मीद
हालांकि, अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से उम्मीद जगी है कि आने वाले 2–5 सालों में रिवर्स माइग्रेशन बढ़ सकता है। रोजगार और निवेश के नए मौके लोगों को वापस लौटने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, SIR में कटे पौने तीन करोड़ वोट सिर्फ एक संख्या नहीं हैं। यह उत्तर प्रदेश के सामने खड़े उन बड़े सवालों को दिखाते हैं, जिनसे अब और मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
