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‘वो’ शब्द जिनके कारण जज शेखर कुमार पर लटकी तलवार, जानें महाभियोग का नियम और किसकी ‘मुहर’ के बाद एक्शन

जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ विपक्ष ने लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग लाने का किया ऐलान, 30 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में किए साइन।

by Digital Desk
दिसम्बर 12, 2024
in Latest News, TOP NEWS, राष्ट्रीय

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नई दिल्ली ऑनलाइन डेस्क। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर कुमार यादव के बयान के बाद सड़क से लेकर संसद तक शोर है। विपक्षी दल अब जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं। जिसको लेकर कांग्रेस के सांसद विवेक तन्खा ने बताया था कि, संसद के इसी शीतकालीन सत्र के दौरान जसिटस को लेकर नोटिस दिया जाएगा। अब तक राज्यसभा के 30 सांसदों ने महाभियोग के पक्ष में साइन कर दिए हैं। फिलहाल प्रस्ताव से जुड़े नोटिस के लिए लोकसभा के 100 और राज्यसभा के 50 सदस्यों की जरूरत होती है।

जस्टिस शेखर कुमार यादव का वो बयान

दरअसल, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में जस्टिस शेखर कुमार यादव शामिल हुए थे। इस मौके पर उन्होंने कहा था कि हिंदू मुसलमानों से यह अपेक्षा नहीं करते कि वे उनकी संस्कृति का पालन करें, बल्कि वे चाहते हैं कि मुसलमान उनकी संस्कृति का अनादर न करे। जस्टिस ने कहा था कि कई पत्नियां रखने, तीन तलाक या हलाला का कोई बहाना नहीं है और ये प्रथाएं अब नहीं चलेंगी.हिन्दुस्तान देश के बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा। यह कानून है। जस्टिस शेखर कुमार यादव ने ‘कठमुल्ला’ शब्द का भी इस्तेमाल किया था।

सुप्रीम कोर्ट भी सख्त

कार्यक्रम में उपस्थित कुछ लोगों ने भाषण का वीडियो बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। जिसके बाद जस्टिस शेखर कुमार यादव का बयान अखबारों की सुर्खियों में छपा। खुद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को लेकर सख्त हो गया। शीर्ष अदालत ने जस्टिस शेखर कुमार यादव की ओर से दिए गए भाषण की न्यूज पेपर्स में छपी रिपोर्ट पर ध्यान दिया है। उसने हाई कोर्ट से मामले पर डिटले में ब्योरा मांगा है। ये मामला विचाराधीन है। वहीं अब राजनीतिक दलों की तरफ से भी जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ पलटवार किया जा रहा है। साथ ही उन्हें तत्काल प्रभाव से हटाए जाने की मांग कर रहे हैं।

महाभियोग के जरिए जज को हटाने का प्रावधान

कानून के जानकार बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज को महाभियोग के जरिये हटाया जा सकता है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 124(4) और अनुच्छेद 217 में इस पर विस्तार से बात की गई है। कानून के जानकार बताते हैं कि जजों के खिलाफ सिर्फ दुराचार व कर्म-अक्षमता के आधार पर ही महाभियोग लाया जा सकता है। दुराचार में ं भ्रष्टाचार, कदाचार से जुड़े मामले आते हैं, जबकि कर्म अक्षमता उस स्थिति को कहते हें जिसमें कोई मानसिक या शारीरिक स्तर की वजह से इस पद और कार्य के योग्य न हो। जजों के खिलाफ महाभियोग के लिए दोनों सदनों की रजामंदी जरूरी है।

इतने सांसदों की पड़ती है जरूरत

कानून के जानकार बताते हैं कि जजों के खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। इसके लिए लोकसभा में 100 सांसदों तो वहीं राज्यसभा में 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है। प्रस्ताव पर साइन होने के बाद इसे को राज्यसभा के सभापति या लोकसभा स्पीकर के सामने पेश किया जाता है। सभापति या स्पीकर प्रस्ताव की प्रारंभिक जांच के लिए एक जांच समिति का गठन करते हैं। समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाईकोर्ट के एक चीफ जस्टिस और एक विशिष्ट विधि विशेषज्ञ शामिल होते हैं। समिति के नामित सदस्य जज पर लगाए गए आरोपों की जांच करते हैं।

राष्ट्रपति की मुहर के बाद ही एक्शन

समिति बकाएदा जांच करती है। जज के बयान लेती है। साथ ही जज ने किस वजह से बयान दिया, इसकी पूरी रिपोर्ट भी तैयार करती है। फिर समिति अपनी रिपोर्ट पेश करती है। अगर समिति की रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाते हैं तो संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाता है। प्रस्ताव को पारित करने के लिए सदन के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि एक सदन में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है। यदि दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद संबंधित जज को उनके पद से हटा दिया जाता है।

अब तक एक भी जज पर नहीं चला महाभियोग

जजों के खिलाफ महाभियोग पर नजर डालें आजादी के बाद आज तक एक भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है। सबसे पहला मामला 90 के दशक में सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट के जज वी रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर महाभियोग लाया गया था। महाभियोग लोकसभा में पास नहीं हो सका। दूसरा केस कोलकाता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन को लेकर सामने आया। सेन के खिलाफ भी महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। पर उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया। 018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन तत्कालीन राज्यसभा सभापति ने उसे खारिज कर दिया था।

कौन हैं जज शेखर कुमार यादव

जज शेखर कुमार यादव का जन्म 16 अप्रैल 1964 को हुआ है। जस्टिस शेखर कुमार यादव ने साल 1988 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से लॉ में ग्रेजुएट किया। 8 सितंबर 1990 को एक वकील के रूप में पंजीकृत हो गए थे। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में सिविल और संवैधानिक मामलों में प्रैक्टिस की थी। शेखर कुमार यादव ने हाई कोर्ट में राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता और स्थायी अधिवक्ता के पद पर काम किया है। जस्टिस शेखर कुमार यादव ने 12 दिसंबर 2019 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपर न्यायाधीश के पद पर शपथ ली थी। इसके साथ बाद 26 मार्च 2021 को स्थायी न्यायाधीश बन गए थे।

गोरक्षा को मौलिक आधार करार दिया

जस्टिस शेखर कुमार यादव ने अपने कार्यकाल में कई निर्णय हिंदी में दिए हैं। जस्टिस शेखर कुमार को बीते महीने जाम्बिया की यसबड यूनिवर्सिटी लुसाका ने कानून में मानद डॉक्टरेट पीएचडी से सम्मानित किया था। उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का निर्णय देते हुए कहा था कि गाय एकमात्र पशु है, जो ऑक्सीजन छोड़ती है। गोरक्षा को मौलिक आधार भी करार दिया था। गोहत्या के आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए उन्होंने ये बातें कही थी। जिसके बाद जज शेखर कुमार सुर्खियों में आ गए थे। इसी क्रम में एक बार फिर वो अपने बयानों के चलते चर्चाओं में आ गए हैं।

Tags: Allahabad High CourtimpeachmentJustice Shekhar Kumar YadavLok SabhaRAJYA SABHASupreme Court

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