West Bengal SIR Voter List Revision:पश्चिम बंगाल इस समय पूरे देश की सबसे बड़ी राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी SIR। इस प्रक्रिया ने लाखों लोगों को चिंतित कर दिया है, क्योंकि राज्य में चल रही वोटर लिस्ट जांच में अब तक 28 लाख नाम हटाए जा चुके हैं। इससे राज्य का राजनीतिक माहौल तेजी से गरम हो गया है।
SIR प्रक्रिया: क्यों हटाए जा रहे इतने नाम?
SIR फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख 4 दिसंबर तय की गई है और यह पूरी प्रक्रिया 7 फरवरी तक चलेगी। सवाल यह है कि इतने व्यापक स्तर पर नाम क्यों हटाए जा रहे हैं? राज्य में चल रहे डिजिटाइजेशन के दौरान पता चला कि 78% काम पूरा होने तक 28 लाख से ज्यादा लोगों के नाम लिस्ट से बाहर कर दिए गए। इनमें लगभग 9 लाख ऐसे मतदाता पाए गए, जिनका निधन हो चुका था। बाकी नाम या तो डुप्लीकेट थे, या उनकी जानकारी उपलब्ध नहीं थी, या वे किसी अन्य स्थान पर स्थायी रूप से चले गए थे।
टीएमसी की सक्रियता: सांसदों का EC से मिलने का कार्यक्रम
तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से बेहद अहम मान रही है। पार्टी नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने मुख्य चुनाव आयुक्त को चिट्ठी लिखकर प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात की मांग की है। हालांकि आयोग ने 10 नहीं बल्कि सिर्फ 5 सांसदों को मिलने की अनुमति दी है। इसके बाद यह मुद्दा और चर्चा में आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
26 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की, जिनमें कई राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने साफ कहा कि आधार को नागरिकता या भारतीय होने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को फॉर्म 6 में दर्ज जानकारी की जांच करने का कानूनी अधिकार है। फॉर्म 6 वह आवेदन है, जिसके जरिए नया नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाता है। अदालत ने आधार के बारे में कहा, “आधार लाभ लेने के लिए दिया गया दस्तावेज है। केवल आधार होने से कोई व्यक्ति मतदाता नहीं बन जाता। अगर कोई विदेशी मजदूरी के लिए भारत आए और उसे आधार मिल जाए, तो क्या उसे वोट का अधिकार दे दिया जाए?”
पीठ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि क्या चुनाव आयोग सिर्फ कागज इकट्ठा करने वाली संस्था है, या उसे तथ्यों की जांच भी करनी चाहिए?
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि SIR प्रक्रिया आम नागरिकों पर भारी बोझ डालती है और इससे कई लोगों के नाम सूची से हट सकते हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी मतदाता का नाम काटने से पहले उचित नोटिस देना जरूरी है, लेकिन इससे आयोग के अधिकार कम नहीं होते।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के लिए सुनवाई की समयसीमा तय की
तमिलनाडु से संबंधित मामलों में चुनाव आयोग 1 दिसंबर तक जवाब देगा और 4 दिसंबर को सुनवाई होगी।
केरल की याचिकाएं 2 दिसंबर को सुनी जाएंगी। पश्चिम बंगाल से जुड़े मामले, जहां बूथ स्तरीय अधिकारियों की आत्महत्या की खबरें भी आई हैं, 9 दिसंबर को सुने जाएंगे। राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग 1 दिसंबर तक अपने जवाब दाखिल करेंगे।








