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Tobacco Addiction, गुटखा और खैनी की सस्ती कीमत, आसान उपलब्धता से बढ़ रही तंबाकू की लत,स्वास्थ्य समस्या हुई गंभीर

भारत में धुआं रहित तंबाकू का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। सस्ती कीमत, आसान उपलब्धता और जागरूकता की कमी के कारण करोड़ों लोग इसकी चपेट में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेतावनी संदेशों से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

by Kirtika Tyagi
June 1, 2026
in Health
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Tobacco Addiction And Growing Concern: तंबाकू से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को लगातार बताया जाता है। सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर बड़ी-बड़ी चेतावनियां भी छापी जाती हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग तंबाकू का सेवन कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल चेतावनी लिख देने से लोगों की आदत नहीं बदलती। जब तक तंबाकू उत्पाद आसानी से उपलब्ध और सस्ते रहेंगे, तब तक इनके इस्तेमाल में कमी लाना मुश्किल होगा।

फिल्मों और समाज का भी असर

एक तरफ लोगों को तंबाकू से दूर रहने की सलाह दी जाती है, वहीं दूसरी ओर कई फिल्मों और मनोरंजन कार्यक्रमों में धूम्रपान को आकर्षक अंदाज में दिखाया जाता है। इसका असर खासकर युवाओं पर पड़ता है। युवा कई बार अपने पसंदीदा कलाकारों की नकल करने लगते हैं, जिससे तंबाकू के प्रति उनकी रुचि बढ़ सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे एक सामाजिक चुनौती भी मानते हैं।

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भारत में गुटखा और खैनी की बड़ी खपत

भारत में तंबाकू का उपयोग सिर्फ सिगरेट तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में लोग गुटखा, खैनी, जर्दा और अन्य धुआं रहित तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। अनुमान है कि देश में करीब 20 करोड़ लोग रोजाना ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। ये उत्पाद बहुत कम कीमत पर लगभग हर दुकान पर आसानी से मिल जाते हैं। इसी कारण इनका उपयोग ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में व्यापक रूप से होता है।

कैंसर का बड़ा खतरा

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ. मधुरिमा नंदी के अनुसार, धुआं रहित तंबाकू में 28 से अधिक ऐसे तत्व पाए गए हैं जो कैंसर का कारण बन सकते हैं। दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक धुआं रहित तंबाकू उपयोगकर्ता भारत में रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिगरेट पर भारी टैक्स लगाया जाता है, लेकिन गुटखा और खैनी जैसे उत्पाद अभी भी अपेक्षाकृत सस्ते हैं। यही कारण है कि इनकी खपत लगातार बनी हुई है।

गरीबी से जुड़ा है तंबाकू का संबंध

डॉ. मधुरिमा नंदी के अनुसार, कम शिक्षा, आर्थिक कमजोरी, ग्रामीण परिवेश, साथियों का दबाव और परिवार में पहले से मौजूद तंबाकू सेवन की आदत इसके प्रमुख कारण हैं। दैनिक मजदूरी करने वाले कई लोगों के लिए दो या तीन रुपये का गुटखा एक सस्ता नशा बन जाता है। निकोटिन कुछ समय के लिए भूख को कम कर देता है, इसलिए कई लोग इसे भोजन के विकल्प की तरह भी इस्तेमाल करने लगते हैं।

परिवारों पर पड़ रहा आर्थिक बोझ

रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार अपने कुल खर्च का बड़ा हिस्सा तंबाकू और नशे से जुड़ी चीजों पर खर्च कर देते हैं। कई बार शिक्षा और जरूरी जरूरतों पर होने वाला खर्च भी प्रभावित होता है। तंबाकू से जुड़ी बीमारियों और समय से पहले होने वाली मौतों के कारण हर साल लाखों परिवार आर्थिक संकट का सामना करते हैं। कई परिवार अपने कमाने वाले सदस्य को खो देते हैं, जिससे गरीबी और बढ़ जाती है।

क्या हो सकता है समाधान?

विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रतिबंध लगाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसके बजाय तंबाकू उत्पादों को महंगा बनाना, उनकी बिक्री को नियंत्रित करना और जागरूकता बढ़ाना ज्यादा प्रभावी कदम हो सकते हैं। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि तंबाकू उत्पादों की न्यूनतम कीमत बढ़ाई जाए, बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य किया जाए, खरीदने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष की जाए और धुआं रहित तंबाकू पर अधिक कर लगाया जाए।

जागरूकता और सख्ती दोनों जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत कानून, सख्त कर नीति, स्पष्ट चेतावनी संदेश और लगातार जागरूकता अभियान ही इस समस्या को कम कर सकते हैं। जब तक गुटखा और अन्य तंबाकू उत्पाद सस्ते और आसानी से उपलब्ध रहेंगे, तब तक इनके दुष्प्रभाव समाज पर पड़ते रहेंगे।

Tags: Gutkha ConsumptionTobacco Addiction
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Kirtika Tyagi

Kirtika Tyagi is a journalist. she is working on sub-editor post and she is expert in International, National, Health, Crime, Lifestyle, Astro beat. 

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