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Cancer Medicines: क्या कैंसर की दवाएं होंगी महंगी, सरकार उठा रही कौन सा कदम, मरीजों की चिंता बढ़ी

देश में कैंसर की कुछ जरूरी दवाओं की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार ने उनकी कीमत बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की है। सरकार का मानना है कि इससे उत्पादन बढ़ेगा और मरीजों को दवाएं आसानी से मिल सकेंगी।

by Kirtika Tyagi
जून 11, 2026
in Health
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Cancer Medicines Become Costlier: देश के कई अस्पतालों में पिछले कुछ समय से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण दवाओं की कमी की शिकायतें सामने आ रही थीं। अब केंद्र सरकार ने इस समस्या को गंभीर मानते हुए कुछ जरूरी दवाओं की कीमत बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

सरकार का कहना है कि दवाओं की लगातार घटती उपलब्धता को देखते हुए यह फैसला लेना जरूरी हो गया था। माना जा रहा है कि कीमत बढ़ने के बाद दवा कंपनियों के लिए इनका उत्पादन आर्थिक रूप से आसान होगा और बाजार में दवाओं की आपूर्ति बेहतर हो सकेगी।

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पहली बार सरकार ने माना दवा संकट

इस फैसले को कई विशेषज्ञ सरकार की ओर से दवाओं की कमी की अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति मान रहे हैं। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले फार्मास्यूटिकल्स विभाग ने 7 जून को राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को पत्र भेजकर आगे की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इस कदम से साफ संकेत मिलता है कि सरकार जरूरी दवाओं की उपलब्धता को लेकर चिंतित है और जल्द समाधान चाहती है।

क्या है पैरा 19 का प्रावधान?

सरकार ने इस मामले में ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ), 2013 के पैरा 19 का इस्तेमाल करने की मंजूरी दी है। यह एक विशेष नियम है, जिसके तहत सरकार जरूरत पड़ने पर सामान्य मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से अलग फैसला ले सकती है। यदि किसी जरूरी दवा की उपलब्धता प्रभावित हो रही हो या मरीजों तक उसकी पहुंच मुश्किल हो रही हो, तो सरकार इस प्रावधान के जरिए कीमतों में विशेष बदलाव की अनुमति दे सकती है।

82 दवाओं की हुई जांच

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार कई दवा कंपनियों ने कुल 82 दवा फॉर्मूलेशन की कीमत बढ़ाने की मांग की थी। इन सभी मामलों की समीक्षा एक अंतर-मंत्रालयी समिति ने की। लंबी जांच के बाद समिति ने केवल चार फॉर्मूलेशन की कीमत बढ़ाने की सिफारिश की है। इनमें कार्बोप्लैटिन इंजेक्शन, सिस्प्लैटिन इंजेक्शन और एंटी-टेटनस इम्युनोग्लोब्युलिन के दो फॉर्मूलेशन शामिल हैं। बाकी 78 मामलों में अभी और जानकारी मांगी गई है।

आखिर क्यों बढ़ रही है लागत?

दवा कंपनियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन खर्च काफी बढ़ गया है। एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट यानी एपीआई की कीमतों में तेजी आई है। इसके अलावा कच्चे माल, निर्माण खर्च और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव का भी असर पड़ा है। कंपनियों का दावा है कि मौजूदा कीमतों पर इन दवाओं का उत्पादन जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है।

टाटा मेमोरियल अस्पताल ने जताई चिंता

समिति की रिपोर्ट में मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल का भी उल्लेख किया गया है। अस्पताल ने कार्बोप्लैटिन और सिस्प्लैटिन इंजेक्शन की कमी को लेकर चिंता जताई थी। ये दोनों दवाएं कई प्रकार के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं और मरीजों के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं। समिति ने भी माना कि इनकी लगातार उपलब्धता सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

मरीजों पर क्या असर पड़ेगा?

फिलहाल नई कीमतें तय नहीं हुई हैं। एनपीपीए को लागत बढ़ने से जुड़े सभी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन करने के लिए कहा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कीमत बढ़ने से इलाज का खर्च कुछ बढ़ सकता है। हालांकि सरकार का तर्क है कि दवा का बाजार से गायब होना, कीमत बढ़ने से कहीं बड़ी समस्या है। यदि कंपनियां उत्पादन कम कर दें या बंद कर दें, तो मरीजों को इलाज में गंभीर परेशानी हो सकती है। इसलिए सरकार फिलहाल दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर ज्यादा जोर दे रही है।

Tags: Cancer treatmentHealth News
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Kirtika Tyagi

Kirtika Tyagi is a journalist. she is working on sub-editor post and she is expert in International, National, Health, Crime, Lifestyle, Astro beat. 

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