Cancer Vaccine: मॉडर्ना और मर्क की इस तकनीक की खासियत यह है कि वैक्सीन सभी मरीजों के लिए एक जैसी नहीं होगी। डॉक्टर पहले मरीज के ट्यूमर की जेनेटिक प्रोफाइल की जांच करेंगे और उसमें मौजूद खास बदलावों की पहचान करेंगे। इसके बाद इन्हीं बदलावों को ध्यान में रखकर वैक्सीन तैयार की जाएगी।
शरीर को कैंसर पहचानना सिखाती है mRNA तकनीक
इस प्रक्रिया में ट्यूमर से मिले डेटा के आधार पर संभावित नियोएंटीजन चुने जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक वैक्सीन में मरीज के कैंसर से जुड़े 34 तक नियोएंटीजन शामिल किए जा सकते हैं। mRNA के जरिए इनकी जानकारी शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाई जाती है, जिससे टी-कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें निशाना बनाने के लिए तैयार किया जा सके।
कीट्रूडा के साथ मिला बेहतर परिणाम
तीसरे चरण के INTerpath-001 परीक्षण में 1,137 ऐसे मेलानोमा मरीज शामिल थे, जिनका ट्यूमर सर्जरी से निकाला जा चुका था। कुछ मरीजों को कीट्रूडा के साथ पर्सनलाइज्ड mRNA वैक्सीन दी गई, जबकि अन्य को केवल कीट्रूडा दी गई। कंपनियों के मुताबिक, वैक्सीन के साथ इलाज लेने वाले समूह में कैंसर के दोबारा लौटने और शरीर के दूर के हिस्सों में फैलने के जोखिम से जुड़े प्रमुख परिणाम बेहतर रहे।
क्या अभी उपलब्ध है यह कैंसर वैक्सीन?
फिलहाल इसे कैंसर का पक्का इलाज कहना जल्दबाजी होगी। तीसरे चरण के शुरुआती नतीजे सकारात्मक हैं, लेकिन विस्तृत आंकड़ों की समीक्षा और नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया बाकी है। मरीजों की कुल जीवन प्रत्याशा पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह भी आगे के आंकड़ों से स्पष्ट होगा। इसके बावजूद यह व्यक्तिगत कैंसर उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण संभावना मानी जा रही है।







