सहारनपुर जिले में पिछले हफ्ते राष्ट्रीय लोक दल की स्वाभिमान रैली में एक ऐसा राजनीतिक नजारा देखने को मिला, जिसने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में चर्चा बढ़ा दी है। मंच पर RLD प्रमुख जयंत चौधरी के साथ उनकी पत्नी चारू चौधरी भी दिखाई दीं। खास बात यह रही कि चारू ने मंच पर माइक संभाला और कहा कि किसी को भी दूसरे व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने या उसका अपमान करने का अधिकार नहीं है। उनके इस अंदाज को अब सामान्य चुनावी भाषण से आगे की राजनीतिक कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
स्वाभिमान से जोड़
चारू चौधरी की मंच पर मौजूदगी ऐसे वक्त हुई है, जब जयंत चौधरी पहले अखिलेश यादव के चर्चित तंज ‘चवन्नी नहीं है जो पलट जाएंगे’ को जाट समाज के स्वाभिमान से जोड़ चुके हैं। इसके बाद RLD की राजनीति में स्वाभिमान का मुद्दा और ज्यादा प्रमुख दिखाई देने लगा है। पार्टी की कोशिश अब केवल अपने पारंपरिक जाट वोट बैंक तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि दूसरे सामाजिक वर्गों तक भी पहुंच बनाने की बताई जा रही है। ऐसे में चारू चौधरी की सक्रियता को इसी विस्तार वाली रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
सपा का उदाहरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी पहले ही अखिलेश यादव और डिंपल यादव के जरिए एक अलग तरह का संतुलन बनाती नजर आती है। अखिलेश जहां सरकार और विरोधी दलों के खिलाफ आक्रामक राजनीति करते हैं, वहीं डिंपल यादव अपनी सहज और शालीन छवि के जरिए महिलाओं, युवाओं और सामाजिक मुद्दों के बीच पार्टी की मौजूदगी मजबूत करती हैं। 20 जुलाई के CJP संसद मार्च के दौरान भी दोनों की अलग-अलग भूमिकाएं चर्चा में रही थीं। एक तरफ अखिलेश संसद के भीतर सरकार पर हमलावर नजर आए, जबकि डिंपल सड़क पर युवाओं के बीच मौजूद थीं।
RLD की रणनीति
अब सियासी हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या RLD भी इसी तरह के राजनीतिक संतुलन की दिशा में आगे बढ़ रही है। जयंत चौधरी जहां चौधरी चरण सिंह की विरासत, किसान राजनीति और जाट समाज के प्रमुख चेहरे के रूप में जाने जाते हैं, वहीं चारू चौधरी पार्टी के लिए महिला मतदाताओं और शहरी वर्गों के बीच पहुंच बढ़ाने का चेहरा बन सकती हैं। अगर यह प्रयोग आगे बढ़ता है तो RLD की राजनीतिक रणनीति में एक नया आयाम जुड़ सकता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल यह साफ नहीं है कि चारू चौधरी को RLD में भविष्य में कोई औपचारिक जिम्मेदारी या संगठनात्मक पद मिलेगा या नहीं। यह भी संभव है कि वह जयंत चौधरी के राजनीतिक अभियान में पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाती रहें। लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण, परिसीमन और सामाजिक समीकरण जैसे मुद्दों के बीच महिला चेहरों की भूमिका बढ़ती दिख रही है। ऐसे में चारू चौधरी की मंच पर सक्रिय मौजूदगी को लेकर राजनीतिक चर्चा आगे भी जारी रह सकती है।


