मुकदमेबाजी या मेल-मिलाप? राकेश टिकैत ने बताया क्यों खतरनाक है नया UGC कानून!

राकेश टिकैत ने UGC के नए कानून को देश के लिए हानिकारक बताते हुए इसे आपसी रंजिश बढ़ाने वाला करार दिया। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लिए अगले 50 वर्षों हेतु 'एक बच्चा' कानून बनाने और उल्लंघन करने वालों की सुविधाएं छीनने का सुझाव दिया।

Rakesh Tikait

Rakesh Tikait UGC Law 2026: भारतीय किसान यूनियन (BKU) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए नए UGC कानून 2026 की कड़े शब्दों में आलोचना की है। बागपत के दोघट में एक कार्यक्रम के दौरान टिकैत ने चेतावनी दी कि शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के नाम पर लाया गया यह कानून समाज में “आपसी बैर और मुकदमेबाजी” को बढ़ावा देगा। टिकैत का मानना है कि कानूनी जटिलताओं के बजाय विवादों का निपटारा सामाजिक सहमति और मिल-जुलकर करना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने देश की बढ़ती आबादी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सरकार को एक क्रांतिकारी सुझाव दिया। टिकैत ने मांग की कि सरकार को अगले 50 वर्षों के लिए ‘एक बच्चा पैदा करने का कानून’ तुरंत बनाना चाहिए।

जनसंख्या विस्फोट और रोजगार का संकट

Rakesh Tikait ने जनसंख्या नियंत्रण पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस रफ्तार से देश की आबादी बढ़ रही है, वह भविष्य में एक बड़े ‘जनसंख्या विस्फोट’ का कारण बनेगी। उन्होंने आगाह किया कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में संसाधनों की कमी हो जाएगी और युवा रोजगार के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।

टिकैत के सुझाव के मुख्य बिंदु:

UGC कानून 2026: विवाद की जड़ क्या है?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम’ लागू किए हैं। इस कानून का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में होने वाले जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करना है।

इस कानून के तहत कुछ अनिवार्य प्रावधान किए गए हैं:

  1. समान अवसर प्रकोष्ठ (EOC): हर कॉलेज में इस सेल का गठन जरूरी है।

  2. जातिगत दायरे का विस्तार: अब एससी और एसटी के साथ-साथ OBC वर्ग को भी भेदभाव विरोधी सुरक्षा के दायरे में लाया गया है।

  3. जवाबदेही: संस्थानों के प्रमुखों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

Rakesh Tikait और सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों का तर्क है कि इस कानून से झूठे मुकदमों की संख्या बढ़ सकती है, जिससे शिक्षण संस्थानों का माहौल प्रभावित होगा। उनका कहना है कि सामाजिक सुधारों के लिए कानून के डंडे के बजाय आपसी संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।

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