Shashi Tharoor News: केरल में सत्ता वापसी का सपना देख रही कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। पार्टी के सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक, शशि थरूर और हाईकमान के बीच दूरियां साफ नजर आने लगी हैं। हाल ही में कोच्चि में आयोजित ‘महापंचायत’ के दौरान हुए कुछ घटनाक्रमों ने थरूर को इतना आहत किया है कि उन्होंने पार्टी हाईकमान द्वारा दिल्ली में बुलाई गई महत्वपूर्ण बैठक में शामिल न होने का फैसला किया है। सूत्रों के अनुसार, थरूर का मानना है कि उन्हें न केवल मंच पर उचित सम्मान नहीं दिया गया, बल्कि राहुल गांधी के संबोधन में उनका जिक्र तक न होना उनके सार्वजनिक अपमान के समान है। यह गतिरोध ऐसे समय में आया है जब पार्टी को एकजुट होकर चुनाव में उतरने की सख्त जरूरत है।
अपमान के दावों से गरमाई राजनीति
शशि थरूर की नाराजगी की जड़ें कोच्चि के उस मंच पर हैं, जहां उन्हें बताया गया था कि उनकी वरिष्ठता के नाते उनके भाषण के तुरंत बाद राहुल गांधी बोलेंगे। हालांकि, कार्यक्रम के दौरान इस क्रम को बदल दिया गया और राहुल गांधी के आने के बाद भी कई कनिष्ठ नेताओं ने संबोधन किया।
इतना ही नहीं, राहुल गांधी ने अपने पूरे भाषण के दौरान मंच पर मौजूद थरूर का नाम तक नहीं लिया। इस उपेक्षा को थरूर और उनके समर्थकों ने एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा है कि पार्टी के भीतर उन्हें हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जा रही है।
क्या हैं विवाद के मुख्य कारण?
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प्रोटोकॉल का उल्लंघन: थरूर को कार्यक्रम में 15 मिनट पहले पहुंचने और अपना भाषण जल्दी समाप्त करने का निर्देश दिया गया था, जिसे उन्होंने अपनी गरिमा के खिलाफ माना।
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संबोधन का क्रम: उनके बाद कई अन्य नेताओं को मौका देना वरिष्ठता की अनदेखी के रूप में देखा गया।
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राहुल गांधी की चुप्पी: पार्टी के शीर्ष नेता द्वारा उनके नाम का उल्लेख न करना विवाद का सबसे बड़ा कारण बना।
आगे की राह और चुनौतियां
हालांकि थरूर शुक्रवार को केरल लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा ले रहे हैं और राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, लेकिन हाईकमान की बैठक से उनकी अनुपस्थिति पार्टी की आंतरिक एकता पर सवाल खड़े करती है। केरल कांग्रेस में के. मुरलीधरन जैसे नेताओं के साथ उनके मतभेद पहले भी चर्चा में रहे हैं।
अगर समय रहते इस ‘खटास’ को दूर नहीं किया गया, तो 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गुटबाजी उसके चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है। वर्तमान में कांग्रेस नेतृत्व ने इस मामले पर चुप्पी साधी हुई है, लेकिन थरूर की ‘खामोश बगावत’ के संकेत भविष्य के लिए बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।









