Zohra Sehgal : समाज की परवाह किए बिना यूरोप पहुंचीं जोहरा सहगल, फिर बनीं भारतीय सिनेमा की दिग्गज कलाकार

जोहरा सहगल ने उस दौर में समाज की परंपराओं को चुनौती देते हुए जर्मनी जाकर आधुनिक नृत्य की शिक्षा ली और भारतीय रंगमंच व सिनेमा में नई पहचान बनाई। 102 वर्ष के जीवन में उन्होंने कई यादगार फिल्में कीं और पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हुईं।

Birth Anniversary: भारतीय सिनेमा और रंगमंच की दिग्गज कलाकार जोहरा सहगल का नाम आज भी सम्मान और प्रेरणा के साथ लिया जाता है। अपनी शानदार अदाकारी, बेबाक व्यक्तित्व और साहसिक फैसलों के लिए मशहूर जोहरा सहगल ने उस दौर में अपनी अलग पहचान बनाई, जब महिलाओं के लिए सामाजिक दायरे बेहद सीमित थे। उन्होंने परंपराओं को चुनौती देते हुए अपने सपनों को प्राथमिकता दी और भारतीय कला जगत में अमिट छाप छोड़ी।

27 अप्रैल 1912 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जन्मी जोहरा सहगल का पूरा नाम साहिबजादी जोहरा मुमताज उल्लाह खान बेगम था। उनका बचपन उत्तराखंड के चकराता में बीता। कम उम्र में मां का साया उठने के बाद उन्होंने लाहौर के क्वीन मैरी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही उनका स्वभाव जिज्ञासु और साहसी था तथा उन्हें नई चीजें सीखने का शौक था।

यूरोप जाकर रचा इतिहास

पढ़ाई पूरी करने के बाद जोहरा सहगल ने ऐसा कदम उठाया, जिसकी उस समय कल्पना करना भी मुश्किल था। वह जर्मनी के ड्रेसडेन स्थित मैरी विगमैन बैले स्कूल में आधुनिक नृत्य की शिक्षा लेने पहुंचीं। उस दौर में किसी भारतीय महिला का अकेले विदेश जाकर पढ़ाई करना बेहद असाधारण माना जाता था। तीन वर्षों तक उन्होंने वहां नृत्य की बारीकियां सीखीं और यही फैसला उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

रंगमंच से फिल्मों तक का शानदार सफर

भारत लौटने के बाद 1935 में उन्होंने प्रसिद्ध नृत्याचार्य उदय शंकर की डांस मंडली से अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने जापान, मिस्र, यूरोप और अमेरिका सहित कई देशों में भारतीय नृत्य का प्रदर्शन किया। बाद में उन्होंने पृथ्वी थिएटर और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) के साथ लंबे समय तक काम किया।

फिल्मी सफर की शुरुआत 1946 में फिल्म ‘धरती के लाल’ से हुई। इसके बाद ‘नीचा नगर’, ‘दिल से’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘कल हो ना हो’, ‘वीर-जारा’, ‘चीनी कम’ और ‘सांवरिया’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया।

सम्मान और विरासत

जोहरा सहगल को भारतीय कला जगत में उनके असाधारण योगदान के लिए पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और कालिदास सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 10 जुलाई 2014 को 102 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी कलाकारों की नई पीढ़ी को प्रेरित करती है।

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