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क्या है साइबरकॉन्ड्रिया ? इस के बढ़ते मामलों ने बढ़ाई विशेषज्ञों की चिंता

Health Anxiety: डिजिटल दौर में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी हासिल करना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित चैटबॉट्स लोगों को कुछ ही सेकंड में संभावित बीमारियों और लक्षणों की जानकारी दे देते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यही सुविधा कई बार लोगों की चिंता का कारण भी बन सकती है।

मामूली गांठ से शुरू हुई चिंता

मुंबई में एक बड़े बैंक में कार्यरत 41 वर्षीय रितोबान सेन ने सात महीने पहले अपने घुटने पर एक छोटी-सी गांठ देखी। परिवार में कैंसर का इतिहास होने के कारण वह चिंतित हो गए। उन्होंने अपनी स्थिति से जुड़ी तमाम जानकारियां ChatGPT में दर्ज कीं।

AI से मिले जवाब में संभावित कारणों की लंबी सूची थी, जिसमें बोन कैंसर की आशंका का भी जिक्र था। इससे उनकी चिंता और बढ़ गई।

डॉक्टरों की राय के बावजूद नहीं मिली तसल्ली

सेन ने मुंबई के तीन कैंसर विशेषज्ञों से परामर्श लिया। तीनों डॉक्टरों ने जांच के बाद इसे सामान्य सूजन बताया और बायोप्सी की जरूरत से इनकार कर दिया।

इसके बावजूद उनकी चिंता खत्म नहीं हुई। आखिरकार उन्होंने चौथी राय लेने के लिए न्यूयॉर्क का रुख किया। वहां भी डॉक्टरों ने वही निष्कर्ष निकाला कि गांठ गंभीर नहीं है।

बाद में सेन ने स्वीकार किया कि उस समय उनकी चिंता हकीकत से कहीं अधिक बढ़ गई थी।

क्या है साइबरकॉन्ड्रिया?

विशेषज्ञों के अनुसार, साइबरकॉन्ड्रिया ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने स्वास्थ्य संबंधी लक्षणों को बार-बार इंटरनेट या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खोजता रहता है। इसका उद्देश्य आश्वासन पाना होता है, लेकिन अक्सर इसके उलट परिणाम सामने आते हैं।

लक्षणों की बार-बार जांच करने से व्यक्ति को गंभीर बीमारियों का डर सताने लगता है और उसकी चिंता बढ़ती जाती है। AI चैटबॉट्स द्वारा दिए गए संभावित उत्तर भी कभी-कभी इस डर को और बढ़ा सकते हैं।

AI उपयोग करते समय बरतें सावधानी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ChatGPT और अन्य AI टूल्स जानकारी देने में मददगार हो सकते हैं, लेकिन इन्हें डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर अंतिम निर्णय हमेशा योग्य चिकित्सक की जांच और सलाह के आधार पर ही लेना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि AI से मिली जानकारी को मार्गदर्शन के रूप में लें, न कि अंतिम चिकित्सा निष्कर्ष के रूप में। इससे अनावश्यक चिंता और गलतफहमियों से बचा जा सकता है।

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