Bangladesh July Charter Controversy: बीएनपी ने लिया बड़ा फैसला बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। सरकार में आते ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने जुलाई चार्टर को मानने से साफ इनकार कर दिया है। तारिक रहमान समेत बीएनपी के कई सांसदों ने संवैधानिक सुधार आयोग के सदस्य के तौर पर शपथ लेने से मना कर दिया। पार्टी नेताओं ने साफ कहा कि वे इस चार्टर को स्वीकार नहीं करते। इस फैसले के बाद जुलाई चार्टर का भविष्य अब अधर में लटक गया है और बांग्लादेश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।
यूनुस सरकार को बड़ा झटका
बांग्लादेश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने जुलाई चार्टर का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव पर जनमत संग्रह भी कराया गया था, जिसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने समर्थन दिया था। सरकार का मानना था कि इससे देश में राजनीतिक और संवैधानिक सुधार होंगे। लेकिन अब बीएनपी के इस रुख से यूनुस सरकार को बड़ा झटका लगा है। बीएनपी ने साफ कर दिया है कि अगर वह सत्ता में रहती है, तो जुलाई चार्टर को लागू नहीं किया जाएगा।
सांसदों ने नहीं ली शपथ
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई चार्टर लागू करने की प्रक्रिया शुरू होनी थी। इसके पहले चरण में सभी सांसदों को संवैधानिक सुधार आयोग के सदस्य के रूप में शपथ लेनी थी। लेकिन जैसे ही बीएनपी के सांसद मंच पर पहुंचे, उन्होंने शपथ लेने से इनकार कर दिया। इस फैसले की अगुवाई खुद पार्टी प्रमुख तारिक रहमान कर रहे थे। बीएनपी नेता सलाहुद्दीन अहमद ने कहा कि उनकी पार्टी इस चार्टर को स्वीकार नहीं करती और अपने तरीके से आगे बढ़ेगी।
जमात-ए-इस्लामी भी विरोध में
बीएनपी के साथ-साथ जमात-ए-इस्लामी ने भी जुलाई चार्टर का विरोध किया है। पार्टी के नायब अमीर सैयद अब्दुल्ला मुहम्मद ताहेर ने कहा कि उनके सांसद भी इस आयोग की शपथ नहीं लेंगे। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी स्वतंत्र रूप से अपना राजनीतिक रास्ता तय करेगी। जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों में से एक है और उसके इस फैसले से सरकार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
जुलाई चार्टर में क्या प्रस्ताव थे
जुलाई चार्टर को बांग्लादेश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा था। इसमें संसद को दो सदनों वाला बनाने, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता मजबूत करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। इसके अलावा प्रधानमंत्री को एक से ज्यादा पद रखने से रोकना और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था लागू करना भी इसमें शामिल था। लेकिन बीएनपी और जमात के विरोध के कारण अब इन सुधारों पर संकट मंडरा रहा है।
राजनीति अनिश्चितता बढ़ी
विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई चार्टर पर बना विवाद बांग्लादेश की राजनीति में अस्थिरता बढ़ा सकता है। अगर मुख्य दलों के बीच सहमति नहीं बनती, तो सुधारों की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। फिलहाल पूरे देश की नजर अब आगे होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी है।



