Houthi Saudi Arabia Blockade: यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी लागू करने का ऐलान किया है। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने एक टीवी संबोधन में कहा कि यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। उन्होंने इसे सऊदी अरब की कथित कार्रवाई का जवाब बताते हुए कहा कि अगर उनके खिलाफ नाकेबंदी की जाएगी तो उसका जवाब भी नाकेबंदी से दिया जाएगा। हूतियों के इस ऐलान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इसका असर सिर्फ सऊदी अरब तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि लाल सागर और अरब सागर के समुद्री मार्गों से जुड़े देशों के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
सऊदी अरब और हूतियों के बीच क्यों बढ़ा तनाव
हूतियों और सऊदी अरब के बीच हाल के दिनों में तनाव तेजी से बढ़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, पिछले सप्ताह सऊदी समर्थित यमनी सरकार ने सना एयरपोर्ट पर कार्रवाई की थी। बताया गया कि इस कार्रवाई का मकसद ईरान से आने वाली एक फ्लाइट को रोकना था, जिस पर हूती विद्रोहियों के लिए हथियार पहुंचाने का आरोप लगाया जा रहा था। इसके बाद हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के अबहा एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले किए थे। हूतियों का आरोप है कि सऊदी अरब यमन की परिवहन व्यवस्था पर कई तरह की पाबंदियां लगा रहा है। संगठन ने इन्हीं कार्रवाइयों को आधार बनाकर समुद्री नाकेबंदी का फैसला लेने की बात कही है।
लाल सागर में फिर गहरा सकता है समुद्री संकट
हूतियों की समुद्री नाकेबंदी की धमकी को इसलिए गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि संगठन पहले भी लाल सागर और अदन की खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बना चुका है। गाजा युद्ध के दौरान हूतियों के हमलों के बाद कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। इसके बजाय कंपनियों ने अफ्रीका के दक्षिणी छोर से होकर केप ऑफ गुड होप का लंबा समुद्री मार्ग अपनाया। इससे जहाजों की यात्रा का समय और परिवहन लागत दोनों बढ़ गए थे। अगर इस बार सऊदी अरब के समुद्री मार्गों पर भी खतरा बढ़ता है तो वैश्विक सप्लाई चेन पर एक बार फिर दबाव पड़ सकता है।
यानबू बंदरगाह पर खतरा बढ़ा तो तेल बाजार प्रभावित हो सकता है
सऊदी अरब के पश्चिमी तट पर स्थित यानबू बंदरगाह देश के तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर हूती विद्रोही समुद्री प्रतिबंध को लागू करने के लिए इस क्षेत्र के आसपास जहाजों की आवाजाही को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं तो इसका असर ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। समुद्री परिवहन में रुकावट आने से कच्चे तेल और अन्य सामान की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और शिपिंग लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हूती अपनी घोषित नाकेबंदी को किस तरीके से लागू करेंगे।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों के जरिए पश्चिम एशिया से पूरा होता है। अगर लाल सागर, अरब सागर या आसपास के समुद्री क्षेत्रों में तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल की सप्लाई, माल ढुलाई और आयात-निर्यात पर असर पड़ सकता है। जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ा तो परिवहन लागत बढ़ने के साथ सामान की डिलीवरी में भी देरी हो सकती है। इसका असर तेल की कीमतों से लेकर भारत के व्यापारिक खर्च तक दिखाई दे सकता है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि हूतियों की नाकेबंदी कितने क्षेत्र तक और कितने समय के लिए लागू रहती है।
मिसाइल और ड्रोन क्षमता के कारण हूतियों को माना जाता है गंभीर खतरा
हूती विद्रोहियों के पास सीमित संसाधन होने के बावजूद मिसाइल और ड्रोन हमले करने की क्षमता है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने कई बार यह दिखाया है कि वे रणनीतिक समुद्री मार्गों और जहाजों की आवाजाही को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि उनकी नई घोषणा को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है। अगर सऊदी अरब और हूतियों के बीच टकराव और बढ़ता है तो इसका प्रभाव मध्य-पूर्व की सीमाओं से बाहर भी जा सकता है। वैश्विक समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ने की आशंका है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि हूती अपनी समुद्री नाकेबंदी को किस तरह लागू करते हैं और सऊदी अरब इसका क्या जवाब देता है।
