Iran-US Agreement: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक सफलता सामने आई है। दोनों देशों ने युद्ध जैसी स्थिति को रोकने और क्षेत्र में शांति बनाए रखने को लेकर समझौते की पुष्टि कर दी है। फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य और सैन्य गतिविधियों से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनी है। वहीं, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर आगे अलग से बातचीत होने की उम्मीद जताई जा रही है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दी जानकारी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए इस समझौते की जानकारी साझा की। उन्होंने सभी पक्षों को बधाई देते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के खोलने की मंजूरी दी जा रही है। इसके साथ ही अमेरिकी नौसेना की ओर से लगाई गई नाकेबंदी को हटाने का भी आदेश दे दिया गया है।
ईरान ने रखी अपनी शर्त
ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सरकारी टेलीविजन पर समझौते की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि समझौता तय हो चुका है, लेकिन शुक्रवार को आधिकारिक हस्ताक्षर होने तक तेहरान इसे पूरी तरह लागू नहीं करेगा। उनके अनुसार, यह सहमति तेहरान में कतर के प्रतिनिधियों के साथ करीब 14 घंटे से अधिक चली बातचीत के बाद बनी है। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान और कतर ने महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
पाकिस्तान ने सबसे पहले किया ऐलान
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सबसे पहले इस समझौते की घोषणा की। उन्होंने बताया कि दोनों पक्षों ने लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई को तुरंत और स्थायी रूप से रोकने पर सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में तकनीकी स्तर की बैठकों का आयोजन किया जाएगा, जिससे समझौते को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
कूटनीतिक प्रयासों को मिली सफलता
शहबाज शरीफ ने कहा कि यह समझौता कई क्षेत्रीय देशों और मध्यस्थों के सहयोग से हुई लंबी बातचीत का परिणाम है। उन्होंने कतर की नेतृत्व क्षमता और समर्थन की सराहना की। साथ ही सऊदी अरब और तुर्की के योगदान को भी अहम बताया। उनका कहना है कि यह समझौता पूरे पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
क्षेत्र में शांति की बढ़ी उम्मीद
समझौते के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को व्यावसायिक जहाजों के लिए फिर से खोल दिया जाएगा। उन्होंने समुद्री व्यापार और तेल आपूर्ति को सामान्य बनाने की बात कही। यदि 19 जून को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित हस्ताक्षर सफलतापूर्वक हो जाते हैं, तो क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की नई शुरुआत हो सकती है।


