Russia Oil Export Cut: यूक्रेन और रूस के बीच जारी संघर्ष का असर अब ऊर्जा क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हाल के दिनों में यूक्रेन द्वारा किए गए ड्रोन हमलों ने रूस की तेल व्यवस्था को प्रभावित किया है। पहले से ही ईंधन की कमी और रिफाइनरियों में आ रही परेशानियों का सामना कर रहे रूस पर अब अतिरिक्त दबाव बन गया है। इसी वजह से रूस इस महीने अपने कच्चे तेल के निर्यात में बड़ी कटौती करने की तैयारी कर रहा है। सरकार घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक तेल देश के अंदर ही इस्तेमाल करना चाहती है।
निर्यात में आ सकती है बड़ी गिरावट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जून महीने में रूस के प्रमुख पश्चिमी बंदरगाहों से होने वाला कच्चे तेल का निर्यात काफी कम हो सकता है। अनुमान है कि यह घटकर लगभग 17 लाख बैरल प्रतिदिन तक रह सकता है, जबकि मई में यह आंकड़ा करीब 25 लाख बैरल प्रतिदिन था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट रूस के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उसे एक साथ घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति दोनों को संतुलित करना पड़ रहा है।
तेल ठिकानों पर यूक्रेन के हमले
हाल के दिनों में यूक्रेन ने रूस के कई महत्वपूर्ण तेल ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें नोवोरोस्सिय्स्क के पास स्थित ग्रुशोवाया ऑयल ट्रांसशिपमेंट बेस भी शामिल है, जो रूस के प्रमुख तेल निर्यात केंद्रों में गिना जाता है। इसके अलावा वोल्गोग्राद क्षेत्र और क्रीमिया के कुछ ईंधन भंडारण केंद्रों पर भी हमले किए गए। रूसी अधिकारियों ने कुछ स्थानों पर आग लगने की पुष्टि की है, हालांकि नुकसान की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
घरेलू जरूरतों पर रहेगा फोकस
रूस अब अपनी रिफाइनरियों में तेल प्रोसेसिंग बढ़ाने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस महीने तेल प्रसंस्करण क्षमता में 2.5 लाख से 4 लाख बैरल प्रतिदिन तक की बढ़ोतरी की जा सकती है।
गर्मी के मौसम में ईंधन की मांग बढ़ने और कुछ क्षेत्रों में कमी की शिकायतों को देखते हुए सरकार घरेलू बाजार को प्राथमिकता देना चाहती है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
रूस से तेल आपूर्ति में कमी का असर भारत पर भी दिखाई दे सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना शुरू किया है। वर्तमान में भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा रूस से आयात करता है। यदि रूस निर्यात कम करता है, तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे आयात लागत बढ़ सकती है और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बन सकता है।
महंगाई बढ़ने का भी खतरा
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता घटती है, तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में भारत में महंगाई बढ़ने का जोखिम भी पैदा हो सकता है।
