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Indian Coffee House: लखनऊ का ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस हुआ बंद, जहां कभी जुटते थे कई महान दिग्गज

Indian Coffee House: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हजरतगंज की पहचान सिर्फ बाजारों और नवाबी अंदाज से नहीं है। यहां स्थित इंडियन कॉफी हाउस भी शहर की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रहा है। वर्ष 1938 में शुरू हुआ यह स्थान दशकों तक राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक चर्चाओं का प्रमुख केंद्र बना रहा।फिलहाल यह कॉफी हाउस करीब तीन महीने से बंद है और इसके दरवाजों पर ताला लगा हुआ है।

एक टेबल पर पत्रकार, दूसरी पर नेता

इंडियन कॉफी हाउस की खासियत सिर्फ इसकी कॉफी नहीं थी, बल्कि यहां का खुला और बेबाक माहौल था। किसी टेबल पर पत्रकार बैठे नजर आते थे तो दूसरी ओर नेता, लेखक, कवि, प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता चर्चा करते दिखाई देते थे।

राजनीति से लेकर साहित्य, सामाजिक मुद्दों और देश-दुनिया की घटनाओं तक पर घंटों बहस चलती थी। यहां आने के लिए किसी विशेष निमंत्रण की जरूरत नहीं होती थी। एक कप कॉफी लेकर कोई भी व्यक्ति चर्चाओं का हिस्सा बन सकता था।

नेहरू से लोहिया और वाजपेयी तक आते थे बड़े नेता

पुराने दौर में इंडियन कॉफी हाउस में देश और प्रदेश के कई बड़े नेताओं की आवाजाही रहती थी। जवाहरलाल नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, फिरोज गांधी, वीपी सिंह, एनडी तिवारी, वीर बहादुर सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं से जुड़ी यादें इस जगह को खास बनाती हैं।

राजनेताओं के साथ-साथ साहित्यकारों और पत्रकारों की मौजूदगी ने भी इसे लखनऊ के बौद्धिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया था।

बदलते दौर में कम होती गई कॉफी हाउस की रौनक

समय के साथ लखनऊ में कैफे कल्चर तेजी से बदला। बड़े ब्रांड और नए तरह के कैफे सामने आए, लेकिन इंडियन कॉफी हाउस लंबे समय तक अपने पुराने अंदाज में कायम रहा।

आज जब राजनीतिक और सामाजिक बहसों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर हो रहा है, ऐसे में इस ऐतिहासिक जगह का बंद होना शहर के पुराने बौद्धिक माहौल के कमजोर पड़ने का संकेत माना जा रहा है।

‘यह केवल भवन नहीं, राजनीतिक विमर्श का अध्याय’

समाजवादी चिंतक दीपक मिश्र के अनुसार, कॉफी हाउस सिर्फ एक स्थान या भवन नहीं बल्कि भारतीय राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। उनके मुताबिक यहां से कई बहसों की शुरुआत हुई और लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूती मिली।

उनका मानना है कि लोहिया के लखनऊ प्रवास के दौरान कॉफी हाउस समाजवादी आंदोलन के प्रमुख केंद्रों में से एक बन जाता था। ऐसे में इस ऐतिहासिक जगह को बचाए रखना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

क्या लौटेगी पुराने कॉफी हाउस की रौनक?

तीन महीने से बंद पड़े इंडियन कॉफी हाउस ने पुराने दौर से जुड़े लोगों को चिंतित किया है। यह जगह सिर्फ कॉफी पीने का ठिकाना नहीं थी, बल्कि कई पीढ़ियों के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक संवाद की गवाह रही है। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि यह ऐतिहासिक कॉफी हाउस दोबारा कब खुलेगा और क्या इसकी पुरानी रौनक फिर लौट पाएगी।

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