Political Shift in Rampur:समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने रामपुर की राजनीति में ऐसा कदम उठाया है, जिससे हलचल तेज हो गई है। उन्होंने बसपा से सपा में आए पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री सुरेंद्र सिंह सागर को प्रदेश सचिव बना दिया। खास बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब रामपुर में Azam Khan की सीधी भूमिका नहीं दिख रही है। पहले यहां पार्टी का कोई भी बड़ा फैसला उनकी सहमति के बिना नहीं होता था।
बदलते राजनीतिक संकेत
हाल के लोकसभा चुनाव में भी आजम खान की पसंद को दरकिनार करते हुए Mohibullah Nadvi को टिकट दिया गया था। अब संगठन में भी नए चेहरे आगे लाए जा रहे हैं। सुरेंद्र सिंह सागर की नियुक्ति को इसी कड़ी में देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि अखिलेश अब रामपुर में नए सामाजिक समीकरण, यानी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पर भरोसा जता रहे हैं।
सागर का पहला बयान
प्रदेश सचिव बनते ही सुरेंद्र सिंह सागर ने बहुजन समाज पार्टी और भाजपा पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि Bahujan Samaj Party अब अपने संस्थापक Kanshi Ram के सिद्धांतों से भटक चुकी है। सागर का कहना है कि समाजवादी पार्टी ही अब दलित और पिछड़े वर्ग की असली आवाज बन रही है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा से नाराज ब्राह्मण समाज भी सपा के संपर्क में है और 2027 में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
आजम खान पर संतुलित रुख
जब आजम खान को लेकर सवाल पूछा गया, तो सागर ने संयमित जवाब दिया। उन्होंने आजम खान को पार्टी का मजबूत स्तंभ बताया और कहा कि पूरा PDA समाज उनके जल्द रिहा होने की कामना कर रहा है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सम्मान के शब्दों के पीछे एक सच्चाई यह भी है कि रामपुर में पार्टी की कमान धीरे-धीरे नए नेतृत्व के हाथ में जाती दिख रही है।
2027 पर नजर
सुरेंद्र सिंह सागर ने अखिलेश यादव का धन्यवाद करते हुए साफ कहा कि उनका लक्ष्य 2027 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना है। इसके लिए वे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज को एकजुट करने की रणनीति पर काम करेंगे। समाजवादी पार्टी पहले भी सामाजिक गठजोड़ की राजनीति करती रही है, लेकिन इस बार PDA को और मजबूत रूप में पेश किया जा रहा है।
क्या बदलेगा रामपुर का समीकरण?
रामपुर लंबे समय तक आजम खान का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन हाल के फैसलों से संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी अब नई दिशा में बढ़ रही है।यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीति कितनी सफल होती है और क्या 2027 में सपा अपने लक्ष्य को हासिल कर पाती है।

